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का देवदत्त, भीमसेन का पौण्ड्र, युधिष्ठिर का अनन्तविजय आदि - आदि (द्र. गीता - 1 / 14-18)।
जैन परम्परा में भी शंख को जिनेन्द्र देव के 18 लक्षणों में परिगणित कर (द्र. आदिपुराण- 15 / 37-44) उसके मांगलिक रूप को रेखांकित किया गया है। यह 22 वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का चिह्न माना जाता है । जिनसेनाचार्य-कृत हरिवंशपुराण (5/364) में मंगल द्रव्यों में शंख का भी निर्देश किया गया है ।
(4) दर्पण :
शुद्ध आत्मस्वरूप (परमात्मरूप) की प्राप्ति होना 'मोक्ष' है (सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिः, सिद्धभक्ति - 1 ) । किसी महनीय योग्य गुरु का निमित्त पाकर व्यक्ति को अपने आत्मस्वरूप का भान हो पाता है । लौकिक व्यवहार में दर्पण हमें स्वरूप का दर्शन कराता है- इस दृष्टि से दर्पण शुद्ध आत्मस्वरूप (परमात्मता) के साक्षात्कार या उसकी उपलब्धि का प्रतीक है । सम्भवतः उक्त विशेषता के कारण, दोनों परम्पराओं में इसे मंगल द्रव्यों में समाहित किया गया है ।
महाभारत (5/4/1-11 ) में भी इसे मांगलिक द्रव्य के रूप में निर्दिष्ट किया गया है। जैन परम्परा में भी अनेक ग्रन्थों में दर्पण को मांगलिक माना गया है (द्र. औपपातिक सूत्र - 49, ज्ञाताधर्मकथा - 1 / 153, हरिवंश पुराण - 5/364, 2/72, तिलोयपण्णत्ति - 4 / 1879 188, वसुनन्दिकृत प्रतिष्ठसारसंग्रह - 6/35-36)।
(5) कलश :
पूर्ण कलश आरोग्य-सुख समृद्धि का प्रतीक है | आरोग्यदेव धन्वन्तरि को अमृत कलश लिए हुए वर्णित किया जाता है (द्र. भागवत- 8/8/34-35)। भारतीय मांगलिक कृत्यों में जलपूर्ण घट की उपस्थिति अपेक्षित मानी जाती हैं। नवरात्रा - आराधना में देवी की आराधना के पूर्व, घट-स्थापना आवश्यक मानी जाती है ।
जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सास्कृतिक एकता / 78