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________________ 2/99 14. श्री प्रजासु पदवीं व्रजेत्परा व्यर्थता हि मरणाद्भयङकरा। 2/59 धनहीनता मरण से भी बढकर भयंकर दु:खदायिनी होती है। .. 15. नाम्बुधौ मकरतोऽ हिता। 2/70 समुद्र में रहकर मगरमच्छ से विरोध करना हितवाह नहीं होता। 16. मूलमस्ति विनयो हि धर्मसात्। - धर्म का मूल विनय ही है। 2/73 17. भस्मना किममुना परिष्कृतं धान्यमस्त्यघृणितं न साम्प्रतम्। 12/77 भस्म द्वारा संस्कारित धान्य धुनता नहीं है। 18. स्वर्णमग्निकलितं हि राजते। 2/81 अग्नि के द्वारा तपाया गया सुवर्ण ही चमकदार बनता है। 19. का गतिनिशिं हि दीपकं विना। 2/97 रात्रि में दीपक के विना गति ही क्या है। 20. देयमन्नवसनाद्वनत्पशः स्यात् परोपकृतये सतां रसः। भले पुरुषों का वैभव तो परोपकार के लिए ही हुआ करता है। 21. कन्यकाकनककम्बलिन्विति निर्वपेद्धि जगतां मिथः स्थितिः। 2/100 ___ संसार में जीवों का जीवन निर्वाह परस्पर के सहयोग से ही होता है। 22. नर्वमित्यथमुचिताय दीयतां हीङिगत स्वपरशर्मणे सताम्। 2/104 सत्पुरुषों की चेष्टाएं तो अपने और पराए दोनों के कल्याण के लिए ही होती है। 23. प्रार्थयेत् प्रभुमभिन्नचेतसा चितिस्थतिर्हि परिशुद्धिरेनसाम्। 2/122 चित्त की स्थिरता ही पापों से बचाने वाली होती है। 24. सहेत विद्वानपदे कुतो रतम्। 2/140 विद्वान् पुरुष अयोग्य स्थान में की जाने वाली रति क्रीडा कैसे सहन कर सकता है। 25. भावस्तृणमिवारण्येऽभिसरन्ति नवं नवम्। _2/147 वनों में नयी नयी वास घास चरने वाली गायों की तरह व्यभिचारिणी स्त्रियाँ नवीन-नवीन पुरुषों की ओर अभिसरण किया करती है। 26. वामा गतिर्हि वामानां को नामावेतु तामितः। - 2/150 निश्चय ही स्त्रियों की चेष्टाएँ विपरीत, परस्पर विरुद्ध होती है। इस संसार में कौन पुरुष उनका रहस्य जान सकता है। 27. विसारसन्ततेः किं स्याज्जीवनं जीवनं विना। 3/31 जल के विना मछली का जीवन कैसे ? 28. सहभावो हि वन्धुता। साथ देना ही वन्धुता होती है। 3/70 36666688888888888888888888888500 :386686868888888888 38888882580808888888888888888888888888888888888888888 3287 C 01
SR No.006277
Book TitleAacharya Kshemendra Dwara Pratipadit Chamatkaratva ke Pariprekshya me Aacharya Gyansagar Dwara Virachit Jayoday Mahakavya ka Samikshatmak Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansagar
PublisherDigambar Jain Dharm Prabhavna Samiti
Publication Year2001
Total Pages310
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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