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पुरुष उपर की ओर पैर और नीचे की ओर शिर कर धूप में खड़ा हो, तपस्या करता है तो उसे पुण्य की प्राप्ति होती है और उसके फलस्वरुप यौवत - युवति समूह का उस पर विश्वास जागृत होता है । फलतः युवति समूह आदि भोग उपभोग की सामग्री उसे प्राप्त होती है ।
सज्जनतया वियुक्तो यावत्संयुज्यापि तरुरभूत्तावत् । कौतुकिताssस्तां विपल्लवित्वमप्याविरभूद्यतौऽपवित्वम् ॥'
उस वन में वन-क्रीडा के समय जो वृक्ष समीचीन जन समूह (सज्जनता) से युक्त थे, कौतुकिता - नाना प्रकार के पुष्पों अथवा संगीत आदि विनोद से सहित थे, विपल्लवित्व - रंग बिरंगे विशिष्ट पत्तों से रहित थे तथा वायु और पक्षियों के संचार से सहित थे वे ही वृक्ष जब ( वनक्रीडा के अनन्तर ) समीचीन जनता से रहित हो गये, उनका पुष्प समूहं नष्ट हो गया, उनके नीचे होने वाले नाना विनोद समाप्त हो गये, और पक्षियों की चहल पहल अथवा मन्द सुगन्ध वायु का संचार भी समाप्त हो गया।
इस श्लोक में समासोक्ति से यह अर्थ अन्तनिर्हित है कि जो व्यक्ति सज्जनता सुजनभाव से सहित होने के बाद जब उसे छोड़ देता है तब उसके सब कौतुक विनोद नष्ट हो जाते हैं । यह बात दूर है, विपत्तियों के अंश भी उसे घेर लेते हैं यही नहीं वायु का संचार भी नष्ट हो जाता है। लोग उसके पास आना जाना छोड़ देते हैं जिससे उसे हीनता का अनुभव करना पड़ता है । अतः किसी को सुजनता नहीं छोडनी चाहिए। समासोक्ति का मंजुल निदर्शन द्रष्टव्य है .
चतुरशीतिगुणाडिकतलक्षणेऽत्र तु चतुष्पथके विचरन् क्षये ।
जनितुतैति मृतिं दुरिताक्षतः न पुनरेति परं पदमुद्धतः ॥
चौरासी लाख योनि रूप चौराहे में भ्रमण करता हुआ यह जीव दुष्ट इन्द्रियों का वशीभूत हो क्षणभर में जन्म को प्राप्त होता है और क्षण भर में ही मृत्यु को प्राप्त होता है, परन्तु आगे बढ़कर मुक्ति को प्राप्त नहीं होता ।
जिस प्रकार से चौपड की चारों पट्टियों में भ्रमण करता हुआ पासा ठीक न पड़ने से क्षणभर में जीत का अनुभव करता है और क्षण भर में मारा जाता है परन्तु ऊँचा उठकर केन्द्र को प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार से यह जीव नरकादि चारों गतियों में इन्द्रय विषयों के कारण परिभ्रमण करता हुआ जन्म
1. जयोदयमहाकाव्य, उत्तरार्ध, 14/40
2. वही, 25/42
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