________________
नीतिरेव हि बलादबलीयसी विक्रमोऽलुलनपखस्य को वशिन।
केसरी करिपरीतिकद्रयाद्वन्यते स शबरेण हेलया।
जयकुमार अकम्पन से कहते हैं कि आप शायद यह सोचते हो कि मेरे पास सेनाबल नहीं है किन्तु आपको यह याद रखना चाहिए कि बल की अपेक्षा नीति ही बलवान होती है। देखिये-हाथियों की घटा को नष्ट करने वाला सिंह भी नीति के बलपर अष्टापद द्वारा बात की बात में मार डाला जाता
है।
जयकुमार कहते हैं कि नीति ही बलवान् होती है। अगर कोई मनुष्य अपनी बुद्धिमता से कार्य करे तो वह अपने शत्रु को आसानी से पराजित कर सकता है। अगर उसके पास बल है नीति नहीं है तो वह मनुष्य पराजित हो जायेगा।
सूक्ति के प्रथम पाद से चमत्कार उत्पन्न हो रहा है। एक अन्य श्लोक दृष्टव्य है -
परेण विद्याबलयोः स्वपक्षमपूज्जयः संतुलयन् विलक्षः। स्थानं चकम्पेऽहिचरस्य तावद्भव्यस्य दैवं लभते प्रभावः।।
जयकुमार ने विपक्ष के साथ विद्या और बल दोनों में ही तुलना करते हुए अपने पक्ष को निर्बल पाया तो कुछ उदास हो गया। उसी समय नागचर देव का आसन काँप उठा और वह दौड़ा हुआ आ पहुँचा। सच है कि भव्य पुरुष का प्रभाव अनायास ही भाग्य को अनकूल कर लेता है। __अच्छे पुरुष के कर्म अपने कर्मों की वजह से भाग्य को अनपे अनुकूल बना लेते हैं। उनके कर्मों का प्रभाव ही उनके भाग्य को बदल देता है।
सूक्ति के एक अंश में चमत्कार दृष्टव्य है। .. एक और ललित उदाहरण देखने योग्य है - । सूरः समागत्यतमां स भद्रं सनागपाशं शरमर्धचन्द्रम।
ददो यतश्रचावसरेऽङगवत्ता निगद्यते सा सहकारिसत्ता।।
उस देव ने जयकुमार को एक तो नागपाश दिया और दूसरा अर्धचन्द्र नामक बाण दिया। ठीक ही है मौके पर हाथ बटाना ही सहकारीपन कहा जाता है।
1. जयोदयमहाकाव्य 7/78 2. वही, 8/76
3. वही, 8/77 941520%