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. जो अस्ति रुप है वह नास्ति रुप भी है। जो नित्य है वह अनित्य भी है, जो एक है वह अनेक भी है, जो तद् है वह अतद् भी है।
इस प्रकार से वस्तु का भेद और अभेद दोनों रुप से कहा जाता है। इस सूक्ति में भावलावण्य का सद्भाव है। एक अन्य रूचिर उदाहरण देखिए -
संक्षालनप्रोञ्छनयोः प्रवृत्तस्तनोर्जनोऽयं प्रतिभाति हृत्तः। यतिः सदात्मेकमतिः शरीरसेवास रेवा न समेति धीरः॥
यह संसारी मनुष्य हृदय से शरीर के धोने और पोंछने में संलग्न जान पड़ता है। जबकि निरन्तर एक आत्मा में लीन रहने वाले धीरवीर मुनिराज शरीर की सेवाओं में रुचि को प्राप्त नहीं होते हैं।
संसारी मनुष्य अपनी शरीर सेवा में लगा रहता है। उसे इस नश्वर शरीर से प्यार होता है। मुनिराज इस शरीर को नश्वर जानकर उसमें सेवारत नहीं रहते हैं, तथा आत्म ध्यान में ही अपना जीवन अर्पण करते हैं।
यह समस्त सूक्तव्यापी का सुन्दर दृष्टान्त है। इतस्ततो भो परिमार्जनीवाऽविदग्धनुः सावगुणार्जिनी वाक। वेश्येव विज्ञस्व पुनर्मनुष्यान् सम्मोहयन्ती भृतिकामनु स्यात्॥
इस संसार में अज्ञानी मनुष्य की जो वाणी है, वह इधर - उधर झाखने वाली बुहारी के समान दुर्गुणों का संग्रह करने वाली होती है, पर विवेकी मनुष्य की वाणी वेश्या के समान मनुष्यों को मोहित करती हुई प्रयोजन के अनुसार ही प्रवृत्त होती है। अर्थात् निष्प्रयोजन नहीं होती है।
__जो अज्ञानी मनुष्य है वे तो गलत बातें आत्मसात करते हैं। जैसे झाडु से कूड़ा कचरा इकट्ठा करते हैं। वही काम अज्ञानी मनुष्य अपनी वाणी से करता है। जो ज्ञानवान् मनुष्य हैं वे निष्प्रयोजन कुछ नहीं कहते तथा उनकी बातें मूल्यवान होती है। उसी के द्वारा दूसरों को मोहित करते हैं।
यह सूक्ति भावलावण्य को प्रदर्शित करती है। समस्तसूक्तव्यापी का मनोहारी उदाहरण -
कवितायाः कविः कर्ता रसिकः कोविदः पुनः।
रमणी रमणीयत्वं पतिर्जानाति नो मिता। 1. जयोदयमहाकाव्य 27/9 2. वही, 27/29 3. वही, 28/82