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तुम्हारे मानसिक, वाचनिक और शरीरिक विकार मुझे विचसित नहीं कर सकते। तुम अपने प्रयोजन में निष्पल रही।
एक अन्य उदाहरण देखिए -
अयि सुवशंज! वंशमहीरुहि स्वगतवातवशेन मिथोद्रहि। अपरमत्र न किञ्चिदये फलं कलहवह्निमुपेमि तु केवलम्॥
श्रेष्ठवंश में उत्पन्न आत्मन ! मैं स्वीकय सन्तान के परिपालन की बुद्धिरुप वायु से परस्पर द्रोह करने वाले कुल रुपी वृक्ष अथवा बॉस के वृक्ष पर मात्र कलहरुप अग्नि को प्राप्त करता हूँ, इसके सिवाय अन्य कुछ भी फल नहीं प्राप्त करता।
जिस प्रकार बॉस के फल पर कोई फल नहीं आता, वे परस्पर के संघर्ष से अग्नि ही उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार कुटुम्बरुपी वृक्ष में परस्पर के विसंवाद से कलहरुप अग्नि ही उत्पन्न होती है। उसमें आत्मा का हित करने वाला कोई फल प्राप्त नहीं होता।
जब जयकुमार का वैराग्य भाव जाग उठता है तब उनको सांसरिक जीवन बॉस के समान प्रतीत होता है।
विचार करने पर चमत्कार प्रदर्शित होता है। विचार्यमाण रमणीय का मंजुल निदर्शन देखिए :
न सत् सदैकं गुणसंग्रहत्वाद घृतादयो मोदकमस्तु तत्वात्। अनैक्यमेवास्य तथेतु किञ्चिदेकैकतोऽनैक्यमुपेति किञ्चित्॥
जय कुमार जब भगवान् आदिनाथ के समवसरण में जाते हैं, तो वे आदिनाथ के चरणों का सान्निध्य पाकर इस प्रकार भगवान् की स्तुति करते हैं।
सत् सर्वथा एक नहीं है, क्योंकि वह अनेक गुणों का संग्रह रुप है। घृत शक्कर और आटा आदि को मिलाकर लड्ड बनाया जाता है, अतः वह देखने में एक प्रतीत होता है। कई पदार्थों के संग्रह से बना है उनकी और दृष्टि देने से वह अनेकरुप हो जाता है। परन्तु जीवादि द्रव्यरुप सत् अनेक गुणों के संग्रह रुप होने से लड्डू की तरह अनेकरुता को नहीं प्राप्त होता, क्योंकि घृत, शर्करा आदि पदार्थ अपना पृथक पृथक अस्तित्व लिये हुए लड्ड में संगृहीत होकर एकरुप दिखते हैं, इस प्रकार जीवादि द्रव्यों में रहने वाले ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि गुण अपनी अपनी पृथक सत्ता नहीं रखते और न
1. जयोदयमहाकाव्य, 25/30 2. जयोगयमहाकाव्य, 26/84
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