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30...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता इसकी सर्वोपरि विशेषता है। इसमें प्रत्येक प्राणी को समानतापूर्वक शरण मिलती है इसलिए 'समवसरण' यह इसकी सार्थक संज्ञा है।
श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार समवसरण का सामान्य वर्णन इस प्रकार है
समवसरण की रचना सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर के निर्देशन में देवगण करते हैं। यह अत्यन्त आकर्षक और अनुपम शोभायुक्त होता है। इसकी रचना वृत्ताकार होती है। उसकी चारों दिशाओं में बीस-बीस हजार सीढ़ियाँ रहती है। उन सीढ़ियों पर सभी जन पादलेप औषधियुक्त व्यक्ति की तरह बिना परिश्रम के चढ़ जाते हैं। प्रत्येक दिशा में सीढ़ियों से लगी एक-एक सड़क बनी होती हैं, जो समवसरण के केन्द्र में स्थित प्रथम पीठ तक जाती है।
समवसरण रचना के लिए सर्वप्रथम आभियोगिक देव अपने स्वामी का आदेश पाकर वायु की विकुर्वणा करते हैं जिससे चारों दिशाओं की एक-एक योजनपर्यन्त भूमि का तृण आदि सारा कचरा बाहर हो जाता है। फिर धूल और सन्ताप को दूर करने के लिए बादल का रूप बना कर सुगन्धित जल की वृष्टि करते हैं। उसके बाद घुटना पर्यन्त अधोमुख वाले अचित्त पुष्पों की वृष्टि कर वातावरण को नयनाभिराम बनाते हैं। फिर तीन प्राकारों की रचना करते हैं। वैमानिक (बारह देवलोक के) देव भीतरी रत्नमय परकोटे की रचना करते हैं। ज्योतिष्क (सूर्य-चन्द्र-ग्रह-नक्षत्रादि के) देव मध्य में स्वर्णमय और भवनपति देव (अधोलोक भूमि के ऊपर रहने वाले) बाहरी रजतमय परकोटे की रचना करते हैं।
प्रथम परकोटा में तीर्थङ्कर भगवान के शरीर प्रमाण से बारह गुणा ऊँचा अशोक वृक्ष होता है। उसके नीचे रत्नमयपीठ और उसके ऊपर देवछन्दक होता है। उस पर सिंहासन और सिंहासन के ऊपर छत्र होते हैं। तीर्थङ्कर प्रभु के शासनदेवों (यक्षों) के हाथ में चामर होते हैं और पद्म पर धर्मचक्र होता है। शेष करणीय कार्यों की रचना व्यन्तरदेव (मध्य लोक के इर्द-गिर्द रहने वाले देव) करते हैं।10
आवश्यकनियुक्ति के अनुसार प्रथम परकोटे में तीर्थङ्कर पूर्वाभिमुख विराजमान होते हैं, शेष तीन दिशाओं में देवतागण उस तीर्थङ्कर के प्रतिरूपों का निर्माण करते हैं। तीर्थङ्कर के समीप दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेयकोण) में गणधर