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8...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता वर्तमान सामाचारी में प्रचलित विधि, आचारदिनकर में वर्णित ब्रह्मचर्यव्रत पालन विधि से किञ्चित् भिन्न है।
यदि दिगम्बर-परम्परा में इस व्रतारोपण विधि का स्वरूप देखा जाये तो सागारधर्मामृत में पाँच प्रकार के ब्रह्मचारियों का उल्लेख मिलता है 1. उपनयन, 2. अवलम्ब, 3. अदीक्षा, 4. गूढ़ और 5. नैष्ठिका इनमें नैष्ठिक ब्रह्मचारी जीवनपर्यन्त के लिए इस व्रत को ग्रहण करता है, किन्तु उसके द्वारा यह व्रत किस विधिपूर्वक ग्रहण किया जाए, यह उल्लेख उसमें नहीं है।
यदि वैदिक-परम्परा की दृष्टि से इस संस्कार विधि का अवलोकन करें तो वहाँ ब्रह्मचारी के दो प्रकार प्राप्त होते हैं- 1. उपकुर्वाण और 2. नैष्ठिक। धर्मशास्त्र के अनुसार नैष्ठिक ब्रह्मचारी यावज्जीवन ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करता है। इस सम्बन्ध में यह भी सूचना प्राप्त होती है कि वह सदाकाल समिधा, वेदाध्ययन, भिक्षा, भूमिशयन एवं आत्मसंयम में प्रवृत्त रहता है। संस्कारप्रकाश के मत से नैष्ठिक ब्रह्मचारी व्रतच्युत हो जाये तो उसे व्रतच्युत उपकुर्वाण ब्रह्मचारी की अपेक्षा दुगुना प्रायश्चित्त देना चाहिए।10 स्मृतियों में ब्रह्मचर्यरक्षा के लिए स्मरण, कीर्तन, क्रीड़ा, प्रेक्षण, गुह्यभाषण, संकल्प, अध्यवसाय और क्रियानिष्पत्ति- इन अष्ट मैथुनांगों से दूर रहने का विधान है।11
यदि बौद्ध-परम्परा में इस स्वरूप को देखा जाए तो वहाँ इस व्रत-विधि का अभाव ही है। यद्यपि शीलरक्षा के कतिपय नियम निश्चित रूप से बतलाये गये हैं।
उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि श्वेताम्बर, दिगम्बर एवं वैदिक इन तीनों परम्पराओं में यह व्रत संस्कार यावज्जीवन के लिए स्वीकार किया जाता है। आचारदिनकर में तीन वर्ष की मर्यादा का जो उल्लेख है वह क्षुल्लकत्व, प्रव्रज्या आदि व्रत की अपेक्षा से है। आशय यह है कि जो साधक न्यूनतम तीन वर्ष तक ब्रह्मचर्य जैसे दुष्कर व्रत का पालन करने में सफल हो जाये वह इससे भी श्रेष्ठतर क्षुल्लक भूमिका पर आरूढ़ हो सकता है। इसी अपेक्षा से ब्रह्मचर्यव्रत की अवधि कही गयी है। दूसरे, तीनों परम्पराओं में ब्रह्मचारी के लिए विशिष्ट नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है। इस दृष्टि से तीनों में समानता है।