________________
242...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता
नामस्थापन - तत्पश्चात उपस्थापित शिष्य एक खमासमण देकर कहे - 'हे भगवन्! आप अपनी इच्छा से मेरा नया नामकरण करिए।' तब गुरु-शिष्य के मस्तक पर वासचूर्ण डालते हुए यथोचित नामकरण करते हैं। उसके बाद उपस्थापित शिष्य सभी ज्येष्ठ साधुओं को वन्दन करें। उपस्थित साध्वियाँ, श्रावक एवं श्राविकाएँ उपस्थापित शिष्य को वन्दन करें।
दिशाबन्ध - तदनन्तर उपस्थापित शिष्य एक खमासमण देकर गुरु महाराज से 'दिशाबन्ध' करने का अनुनय करें। तब गुरु चन्द्रकुल, कोटिकगण, वज्र शाखा, अमुक आचार्य और अमुक उपाध्याय का नाम लेकर दिशाबन्ध करें। यदि साध्वी की उपस्थापना हो तो अमुक प्रवर्तिनी का नाम भी लें। यह प्रक्रिया उच्चारण पूर्वक तीन बार की जाती है। प्रचलित परम्परा में दिशाबन्ध
और नामस्थापना दोनों विधियाँ एक साथ सम्पन्न होती हैं। इसमें दिशाबन्ध पूर्वक नामकरण किया जाता है। ____ उपस्थापन के दिन शिष्य को आयंबिल या उपवास करवाया जाता है। वर्तमान में उपवास करवाने की परिपाटी है।
धर्मदेशना - तत्पश्चात गुरु उपस्थित संघ को धर्मदेशना दें। इस देशना में शास्त्र प्रसिद्ध रोहिणी का दृष्टान्त कहें।
तपागच्छ परम्परा में उपस्थापना विधि का स्वरूप लगभग खरतरगच्छ परम्परा के अनुसार ही जानना चाहिए। इसमें क्रम एवं विधि सम्बन्धी भिन्नता इस प्रकार है - 1. यहाँ बृहद नन्दीसूत्र सुनाने की परम्परा है जबकि खरतरगच्छ आम्नाय में लघु नन्दी सुनाते हैं। 2. नन्दीसूत्र सुनाने के पूर्व एवं पश्चात कायोत्सर्ग करने की परिपाटी है। 3. आलापक पाठ सम्बन्धी शब्दों में कुछ हेरफेर है। 4. प्रारम्भिक आलापक पाठों में 'नन्दी करावणी' शब्द का प्रयोग देखा जाता है। 5. इस परम्परा में उपस्थापना की विधि का यह क्रम हैसर्वप्रथम गुरु शिष्य पर वासनिक्षेप करते हैं, फिर आठ स्तुतियों सहित देववन्दन करवाते हैं, फिर स्थापनाचार्य को वन्दन करवाते हैं, फिर कायोत्सर्ग करवाते हैं, फिर एक नमस्कार मन्त्र के उच्चारणपूर्वक तीन बार नन्दीसूत्र सुनाते हैं। पुनः नन्दी निमित्त कायोत्सर्ग करवाते हैं, फिर महाव्रत के दण्डक का उच्चारण करवाते हैं, फिर सात खमासमण के साथ प्रवेदन विधि करवाते हैं, फिर दिशाबन्ध, नामकरण, प्रत्याख्यान और धर्मदेशना आदि की विधि करते हैं।193 इसमें गुरु-शिष्य के आलापक पाठ पूर्ववत समझें।