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उपस्थापना (पंचमहाव्रत आरोपण) विधि का रहस्यमयी अन्वेषण... 243
अचलगच्छ परम्परा में उपस्थापना विधि तपागच्छ आम्नाय के अनुसार की जाती है।194 आचार्य गुणसागरसूरीश्वरजी म.सा. के अनुसार
1. इनमें बड़ी दीक्षा (उपस्थापना) के लिए एक महीने के योग लगातार करवाते हैं। इस योग में नमक वाला आयंबिल तप करवाया जाता है, नीवि तप नहीं होता है।
2. यदि योग चल रहे हों तो बड़ी दीक्षा के दिन भी आयंबिल करवाने की परिपाटी है, उपवास करना अनिवार्य नहीं है।
3. इस परम्परा में उपस्थापित शिष्य को बधाने हेतु वासदान का प्रयोग करते हैं।
पायच्छन्दगच्छीय प्रवर्तिनी ॐकार श्रीजी म.सा. की सुशिष्या साध्वी सिद्धान्तरसा जी के द्वारा प्राप्त सूचना के अनुसार इस परम्परा में उपस्थापनाविधि तपागच्छ सामाचारी के समान करवायी जाती है। इस परम्परा से सम्बन्धित कोई कृति प्राप्त नहीं हो पायी है।
त्रिस्तुतिक परम्परा की सुप्रसिद्ध साध्वी मयूरकला श्रीजी द्वारा निर्दिष्ट जानकारी के अनुसार इस परम्परा में भी उपस्थापना-विधि पूर्ववत ही सम्पन्न की जाती है। इनमें प्राय: लघुदीक्षा से लेकर छह माह के भीतर उपस्थापना कर देते हैं। इनकी परम्परा में साध्वी लघुदीक्षा प्रदान नहीं कर सकती हैं।
स्थानकवासी एवं तेरापंथी परम्पराओं में उपस्थापना की विधि सरल एवं कर्मकाण्ड से रहित है। डॉ. सागरमल जैन के अनुसार लघु दीक्षा से सातवें या आठवें दिन उपस्थापना करने की परिपाटी है। इस विधि में तीन बार वन्दना करवायी जाती है और पांच महाव्रतों सहित रात्रिभोजनविरमण व्रत का आरोपण करवाया जाता है। इनमें पूर्वोक्त दशवैकालिकसूत्र के ही आलापक पाठ बोले जाते हैं। इस दिन विशेष तप करने का कोई विधान नहीं है। इनमें श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्पराओं की भांति दशवैकालिकसूत्र एवं सात मांडली के योग करवाने की सामाचारी भी नहीं है, किन्तु मुनि प्रतिक्रमण एवं दशवैकालिकसूत्र के चार अध्ययनों का अर्थबोध सहित ज्ञान आवश्यक है।
दिगम्बर कृतियों के आधार पर इतना अवगत हो पाया है कि इस परम्परा में दीक्षित पक्ष (जिस पक्ष में लघु दीक्षा हुई है) में अथवा द्वितीय पक्ष में शुभमुहूर्त देखकर व्रतारोपण किया जाता है। उस दिन उपस्थापित शिष्य द्वारा रत्नत्रय की पूजा करवाकर उससे पाक्षिक प्रतिक्रमण का पाठ बुलवाया जाता है।