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152...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता लोच क्रिया को प्रकट करने की अनुमति ग्रहण करें। फिर दूसरा खमासमण देकर लोच का प्रवेदन किस प्रकार करूँ? इसकी अनुज्ञा ग्रहण करें। फिर तीसरा खमासमण देकर लोच के सम्बन्ध में बताएं कि मैंने लोच की पर्युपासना की है। • फिर चौथा खमासमण देकर मुनि संघ के समक्ष लोच का निवेदन करने की अनुमति प्राप्त करें। . फिर पांचवाँ खमासमण देकर एक नमस्कारमन्त्र का उच्चारण करें। • फिर छठा खमासमण देकर केशलोच करवाते समय किसी प्रकार का दोष लगा हो, तो उस दोष से निवृत्त होने के लिए कायोत्सर्ग करने की अनुमति मांगें। • फिर सातवाँ खमासमण देकर लगे हुए दोषों का चिन्तन करते हुए अन्नत्थसूत्र बोलकर ‘सागरवरगम्भीरा' तक लोगस्स का कायोत्सर्ग करें। कायोत्सर्ग पूर्णकर प्रकट में लोगस्ससूत्र बोलें। • फिर बड़े-छोटे के क्रम से सभी साधुओं को वन्दन करें। उसके बाद स्वयं विश्राम करें।
जो मुनि अपना लोच स्वयं करता है उसे संदिसावण एवं प्रवेदन विधि नहीं करनी चाहिए।
तपागच्छ आदि परम्पराओं में केशलोच के पूर्व एवं पश्चात कौन सी विधि करते हैं? तत्सम्बन्धी प्रामाणिक ग्रन्थ देखने में नहीं आये हैं, परन्तु उनके द्वारा संकलित ग्रन्थों में इसकी विधि सामान्य अन्तर के साथ पूर्ववत ही निर्दिष्ट है। ___डॉ. सागरमल जैन के अनुसार स्थानकवासी एवं तेरापंथी परम्पराओं में मात्र केशलुंचन करने से पूर्व वन्दनपूर्वक गुरु की अनुमति ली जाती है और केशलोच होने के पश्चात गुरु को वन्दना की जाती है। इसके अतिरिक्त कोई क्रियाकाण्ड नहीं होता।
दिगम्बर परम्परा के अनुसार केशलुंचन की यह विधि है24- • सर्वप्रथम केशलोचक मुनि पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करे। • फिर ‘लोच-प्रतिष्ठापनक्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थं, भावपूजावंदना-स्तव समेतं, श्रीलघुसिद्धभक्ति कायोत्सर्ग कुर्वेऽहं' इतना पाठ बोलकर नौ बार नमस्कारमन्त्र का जाप करे। • तदनन्तर लघुसिद्धभक्ति का पाठ बोले। • उसके बाद पूर्ववत 'लोच प्रतिष्ठापन क्रियायां, पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकल कर्म क्षयार्थं, भावपूजा-वंदना-स्तव समेतं, श्रीलघुयोगिभक्ति कायोत्सर्ग कुर्वेऽहं' इतना कहकर पूर्ववत नौ बार नमस्कार मन्त्र का चिन्तन करे। • फिर लघुयोगिभक्ति पाठ बोले। इस प्रकार लघुसिद्ध और