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केशलोच विधि की आगमिक अवधारणा... 151
सामाचारीप्रकरण, सामाचारी संग्रह, विधिमार्गप्रपा आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है, उसके बाद के परवर्ती ग्रन्थों में यह विधि संकलित रूप से प्राप्त होती है, जो विधिमार्गप्रपा आदि ग्रन्थों के निर्देशानुसार ही वर्णित की गयी है ।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि केशलोच की परम्परा शास्त्रविहित होने पर भी उसकी विधि 10वीं से 15वीं शती के मध्यवर्ती आचार्यों द्वारा लिखी गयी, जो वर्तमान में अपनी-अपनी सामाचारी के अनुसार प्रचलित है । केशलोच की प्रचलित विधि
केशलोच से पूर्व करने योग्य विधि
विधिमार्गप्रपा के अनुसार लोच इच्छुकं शिष्य गुरु के समीप जायें। फिर दो बार खमासमणसूत्र पूर्वक वन्दन करें। फिर मुखवस्त्रिका का प्रतिलेखन कर द्वादशावर्त्तवन्दन करें।
तदनन्तर एक खमासमणसूत्र पूर्वक वन्दन कर शिष्य कहे - 'इच्छाकारेण संदिसह लोयं संदिसावेमि' हे भगवन् ! आप अपनी इच्छानुसार लोच करवाने की अनुमति प्रदान करें ।
फिर दूसरा खमासमण देकर कहें - 'इच्छा. संदि. लोयं कारेमि' आपकी अनुमति हो तो लोच करवाऊँ ।
फिर तीसरा खमासमण देकर कहें 'इच्छा. संदि. उच्चासणं संदिसावेमि' हे भगवन् ! आप उच्च आसन पर बैठने की अनुज्ञा प्रदान करें । फिर चौथा खमासमण देकर बोलें- 'इच्छा. संदि. उच्चासणं ठामि' हे भगवन् ! आपकी अनुमति से उच्च आसन पर बैठता हूँ।
उसके बाद वह शिष्य लोच करने वाले मुनि को एक खमासमणपूर्वक वन्दन कर निवेदन करें - 'इच्छाकारि लोयं करेह' आप अपनी स्वेच्छा से मेरा लोच करिये। तब लोच करने वाला मुनि लोच करना प्रारम्भ करें | 23 केशलोच के पश्चात करने योग्य विधि
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केशलुंचन हो जाने के पश्चात लोचकृत शिष्य स्थापनाचार्य के सम्मुख ईर्यापथिक प्रतिक्रमण करे। फिर शक्रस्तव बोलकर चैत्यवन्दन करे । तत्पश्चात गुरु के समीप आकर दो खमासमणपूर्वक मुखवस्त्रिका का प्रतिलेखन कर द्वादशावर्त्त वन्दन करें।
प्रवेदन विधि - तदनन्तर लोच करवाया हुआ शिष्य एक खमासमण देकर