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________________ १०० महाकवि ज्ञानसागर के काव्य-एक अध्ययन सपं हमा । सर्प ने हाथी को उस लिया। वह हाथी सहस्रार स्वर्ग में श्रीप्रभारण्य विमान में श्रीधर नाम का देव हुमा । पम्मिल्ल जब बन्दर के रूप में उत्पन्न हुमा तो पसने श्रीभूति रूप को नष्ट कर दिया। बन में विचरण करने वाले किरातराज के सेवक एक भील ने हाथी के मस्तक से मोती और दांत निकालकर अपने एक वश्य मित्र को दे दिये । उसने वे मुक्ताएं और हाथी दांत तुम्हारे पुत्र पूर्णचन्द्र को दिये हैं। हाथीदांत का उपयोग तो उसने अपना पलंग बनवाने में किया है और मोतियों को अपने हार में डाल लिया है। सिंहचन्द्र मुनि के वचन सुनकर रामदत्ता अपने पुत्र को धर्मोपदेश देने के लिए गई। पूर्णचन्द्र ने रामवत्ता के वचन सुनकर श्रावक धर्म अंगीकृत कर लिया; पौर अन्त में वह सहस्रार स्वर्ग के वेडूयं विमान में देव हुआ । रामदत्ता भी स्वयंप्रभ विमान में सूर्यप्रभ देव के रूप में उत्पन्न हुई। तपश्चरण के बाद सिंहचन्द्र ग्रेवेयक में देव हमा। सूर्यप्रभ देव स्वर्ग से निकलकर भरतक्षेत्र में विजया पर्वत के दक्षिण में स्थित धरणीतिलक नगर में प्रतिबल राजा और रानी सुशीला की पुत्री श्रीधरा के रूप में उत्पन्न हुआ । उसका विवाह कालकपुर के सुदर्शन के साथ हो गया । वैडूर्य विमान बाला देव उसकी पुत्री यशोधरा के रूप में उत्पन्न हुमा। विजयाध पर्वत की उत्तरश्रेणी में प्रभात नामक नगर है। वहाँ सूर्यदत्त नामक विद्याधरों का राजा राज्य करता था। यशोधरा का विवाह इसी के साथ हुप्रा । इन दोनों का रश्मिवेग नाम का पुत्र हमा। इस पुत्र को राज्य सौंपकर सूर्यवत्त ने मुनिचन्द्र के समीप दैगम्बरी दीक्षा ग्रहण कर ली। श्रीधरा पोर यशोधरा ने गुणमती प्रायिका के समीप तप करना प्रारम्भ कर दिया। एक बार रश्मिवेग सिद्धकूट में स्थित जिनदेव के पूजन हेतु गया। वहां पर हरिषचन्द्र मुनि के पास में उसने तप किया। एक बार श्रीधरा के साथ पशोपरा उस मुनि को प्रणाम करके वहीं बैठ गई। तब अजगर के रूप में उत्पन्न श्रीभूति के जीव ने उन तीनों को खा लिया। रश्मिवेग कापिष्ठ नामक स्टा में प्रकंप्रभ नामक देव हुअा। दोनों प्रायिकायें भी मरकर उसी स्वर्ग में देवता हुई। अजगर ने दुःज से युक्त चतुर्थ नरक को प्राप्त किया। चक्रपुर में अपरावित नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम सुन्दरी था। सिंहचन्द्र इन दोनों का पुत्र चक्रायुष हुमा । उसकी प्रिया का नाम चित्रमाला था। प्रप्रभ नामक देव इनके पुत्र वज्रायुध के रूप में उत्पन्न हुमा। यह पूर्वजन्म में सिंहसेन था। पृथ्वीतिलक नगर में अतिवेग नाम का राजा था। उसकी पत्नी प्रियंकरा से रामदत्ता के जीव ने जो श्रीपरा के रूप में उत्पन्न हुई थी, इनकी पुत्री रत्नमाला के रूप में जन्म लिया। इसका विवाह पूर्वजन्म की प्रीति के कारण वज्रायुध से हुमा । यशोषरा ने इनके पुत्र रत्नायुध के रूप में जन्म लिया। वह पूर्वजन्म में
SR No.006237
Book TitleGyansgar Mahakavi Ke Kavya Ek Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKiran Tondon
PublisherGyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
Publication Year1996
Total Pages538
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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