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________________ १८० सूत्रसंवेदना-३ स्वीकार करके, शास्त्रों का अध्ययन करके सर्व प्रथम इस मिथ्यात्व को जानने एवं निर्मूल करने का प्रयत्न करना चाहिए एवं उसको दूर करना चाहिए । इस पद का उच्चारण करते समय अनादिकाल से आत्मा में घर बनाए हुए इस शल्य को खूब ही स्पष्ट तरीके से जानकर, दिवस के दौरान जीवन व्यवहार में सूक्ष्म या स्थूल प्रकार से यह पाप कहाँ प्रवर्त रहा है, उसको जानकर, उस पाप के प्रति तिरस्कार भाव प्रगट कर उसकी निंदा, गर्दी करनी है एवं प्रतिक्रमण का परिणाम पैदा करके पाप करने की वृत्ति से मुक्त होकर आत्मा को निर्मल बनाना है । अढार पाप स्थानकमांहि माहरे जीवे जे कोई पाप सेव्यु होय, सेवराव्युं होय,सेवतां प्रत्ये अनुमोद्यं होय ते सविहु मन, वचन, कायाए करी मिच्छा मि दुक्कडं। उपर नामोल्लेख द्वारा जिन पापों का वर्णन किया गया है, उन अठारह में किसी भी पाप का मैंने सेवन किया हो, किसी के पास करवाया हो या करते हुए का अनुमोदन किया हो तो उन सब पाप संबंधी मन, वचन, काया से 'मिच्छा मि दुक्कडं' देता हूँ अर्थात् ये पापरूप मेरा दुष्कृत मिथ्या हो, वैसा मन से सोचता हूँ, वाणी से बोलता हूँ एवं काया के विनम्र व्यवहार से स्वीकार करता हूँ ।" 19.इस सूत्र का आधार स्थान स्थानांग सूत्र के पहले स्थान का ४८वाँ तथा ४९वाँ सूत्र है । प्रवचनसारोद्धार में २३७वे द्वार में नीचे की गाथाएं दी गई हैं सव्वं पाणाइवायं', अलियमदत्तं-३ च मेहुणं सव्वं । सव्वं परिग्गरं तह, राईभत्तं च वोसरिमो ।।५१।। सव्वं कोहं माणं, मायं लोहं च राग दोसें २ य । कलह अब्भक्खाणं ४ पेसुन्न५ पर-परीवायं ६ ।।५२।। मायामोसं" मिच्छादंसण-सल्लं८ तहेव वोसरिमो। अंतिमऊसासंमि देहं पि जिणाइपच्चक्खं ।।५३।। प्रवचनसारोद्धार की इस गाथा में 'रात्रिभोजन' का नाम है एवं 'रति-अरति' का नाम नहीं है । उसके संबंध में उसकी वृत्ति में बताया है कि स्थानाङ्गो च रात्रिभोजनं पापस्थानमध्ये न पठितं, किन्तु परपरिवादाग्रतोऽरतिरतिः ।। स्थानाङ्ग सूत्र में पाप स्थान में रात्रिभोजन' का पाठ नहीं दिखता, परन्तु ‘परपरिवाद' के बाद में 'अरति-रति' का पाठ मिलता है ।
SR No.006126
Book TitleSutra Samvedana Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPrashamitashreeji
PublisherSanmarg Prakashan
Publication Year2012
Total Pages202
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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