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________________ ( ५ ) खंदमांहि पुन जाणजो, पित्ततणो नित वास । जठराग्निमें संचरत, दिवानाथ पति तास ॥१७७॥ नाभिकमलथी वाम दिस, करपल्लव त्रय जाण । नाडी युगल हे कफतणी, रही है येमें आण ॥१७८॥ शशि स्वामि तस जाणजो, ये विवहारी वात । निश्चैथी लख एकमें, तिनु आय समात ।। १७९॥ अपणी अपणी रुत विषे, वाय पीत्त कफ तीन । जोर जणावत देहमें, तस उपचार प्रवीन ॥ १८० ॥ वैद्यकग्रंथ नथी लख्यो, तीणका अधिक प्रकार । मूल तीनसुं होत है, रोग अनेक प्रकार ॥ १८१ ॥ अपणे अमल विसारके, बीजाने घर जाय । रोग. कफादिथी जुइ, सन्निपात .कहेवाय ॥१८२॥ रोमरोममां जगतगुरु, पोणा बे बे रोग । भाख्या प्रवचनमांहि ते, अशुभ उदय तस भोग॥१८३॥ प्रश्न करे रोगीतणो, जैसा स्वरमें आय । स्वर फुनि तत्त्व विचारके, तैसा रोग कहाय ॥१८४॥ अपणे स्वरमें आपणा, तत्त्व चले तिण वार । तो रोगीना पिंडमां, रोग एक थिर धार ॥ १८५ ।
SR No.005739
Book TitlePadyavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay, Kunvarji Anandji
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year1995
Total Pages376
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size16 MB
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