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________________ संतेहिं 4 अणिठेहिं 5 वागरणेहिं वागरिया / तं णं तुम एयस्स ठाणस्स आलोएहि जाव जहारिहं च पायच्छित्तं पडिवज्जाहि" || 261 // छाया ततः खलु स महाशतकः श्रमणोपासको रेवत्या गाथापल्या द्वितीयमपि तृतीयमप्येवमुक्तः सन् आशुरुप्तः 4 अवधिं प्रयुनक्ति, प्रयुज्यावधिना आभोगयति, आभोग्य रेवती गाथापलीमेवमवादीत् यावदुत्पत्स्यसे! नो खलु कल्पते गौतम! श्रमणोपासकस्याऽपश्चिमयावज्जोषितशरीरस्य भक्तपानप्रत्याख्यातस्य परः सद्भिस्तत्त्वैस्तथ्यैः सद्भूतैरनिष्टैरकान्तैरप्रियैरमनोज्ञैरमनआपैर्व्याकरणैर्व्याकर्तुम्" तद् गच्छ खलु देवानुप्रिय ! त्वं महाशतकं श्रमणोपासकमेवं वद—“नो खलु देवानुप्रिय ! कल्पते श्रमणोपासकस्यापश्चिमयावद्, भक्तपानप्रत्याख्यातस्य परः सद्भिर्यावद् व्याकर्तुम् |" त्वया च खलु देवानुप्रिय! रेवती गाथापली सद्भिः 4 अनिष्टैः, 5 व्याकरणैर्व्याकृता, ततः खलु त्वमिदं स्थानमालोचय यावद्यथाहं च प्रायश्चित्तं प्रतिपद्यस्व / " . .. शब्दार्थ तए णं से महासयए समणोवासए तदनन्तर वह महाशतक श्रमणोपासक, रेवईए गाहावइणीए-रेवती गाथापत्नी द्वारा, दोच्चंपि तच्चंपि एवं वुत्ते समाणे दूसरी तथा तीसरी बार ऐसा कहे जाने पर, आसुरुत्ते ओहिं पउंजइ-क्रुद्ध हो गया और अवधिज्ञान का प्रयोग किया, पउंजित्ता—प्रयोग करके, ओहिणा आभोएइ–अवधिज्ञान द्वारा देखा, आभोइत्ता देखकर के, रेवई गहावइणिं एवं वयासी-रेवती गाथापत्नी को ऐसा कहने लगा। जाव उववज्जिहिसि—यावत् तू (नरक में) उत्पन्न होगी, नो खलु कप्पइ गोयमा! हे गौतम! नहीं कल्पता, समणोवासगस्स–श्रमणोपासक को, अपच्छिम जाव झूसिय सरीस्स-जिसने अन्तिम संलेखना ले रखी है और, भत्तपाणपडियाइक्खियस्स—आहार पानी का त्याग कर रखा है, परो—दूसरे व्यक्ति के प्रति, संतेहिं तच्चेहिं तहिएहिं सब्भूएहिं सत्य, तत्व तथा सद्भूत होने पर भी, अणिठेहिं अकंतेहिं अप्पिएहिं अमणुण्णेहिं अमणामेहिं वागरणेहिं वागरित्तए—अनिष्ट, अकान्त (अप्रिय) अमनोज्ञ-मन को अच्छा न लगने वाले, अमनाम-विचार करने पर भी दुखदायी वचन बोलना / तं गच्छ णं देवाणुप्पिया! इसलिए हे देवानुप्रिय! जाओ, तुमं महासययं समणोवासयं एवं वयाहि—तुम श्रमणोपासक महाशतक से ऐसा कहो-नो खलु देवाणुप्पिया! नो कप्पइ समणोवासगस्स हे देवानुप्रिय! श्रमणोपासक को नहीं कल्पता, अपच्छिम जाव भत्तपाण–पडियाइक्खियस्स—जिसने अन्तिम संलेखना यावत् आहार पानी का त्याग कर रखा है, परो संतेहिं जाव वागरित्तए दूसरे व्यक्ति के प्रति सत्य होने भी अनिष्ट यावत् वचन बोलना। तुमे य णं देवाणुप्पिया! और तुमने हे देवानुप्रिय! रेवई गाहावइणी रेवती गाथापली को, संतेहिं 4 अणिठेहिं 5 वागरणेहिं वागरिया सत्य होने पर भी अनिष्ट बातें कहीं, तं णं तुमं—इसलिए तुम, एयस्स ठाणस्स आलोएहि इस भूल के लिए आलोचना करो, जाव-यावत्, जहारिहं च पायच्छित्तं पडिवज्जाहि—यथायोग्य प्रायश्चित अङ्गीकार करो। श्री उपासक दशांग सूत्रम् / 350 / महाशतक उपासक, अष्टम अध्ययन,
SR No.004499
Book TitleUpasakdashang Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2003
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_upasakdasha
File Size9 MB
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