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________________ टीका—पांचवें इच्छापरिमाणव्रत में परिग्रह सम्बन्धी मर्यादा की जाती है। प्रस्तुत व्रत में व्यापार, सैनिक अभियान अवया अन्य प्रकार के स्वार्थपूर्ण कार्यों के लिए क्षेत्र की मर्यादा की गई है। और उस मर्यादा का अतिक्रमण अतिचार माना गया है। आनन्द ने जब व्रतों को स्वीकार किया उस समय इस व्रत का निर्देश नहीं आया है। इसी प्रकार आगे बताए जाने वाले चार शिक्षापदों का निरूपण भी नहीं आया। सामायिक आदि शिक्षाव्रत समस्त जीवन के लिए नहीं होते। वे घडी. दो घडी या दिन-रात आदि निश्चित काल के लिए होते हैं। सम्भवतया इसी कारण इनका अहिंसा, सत्य आदि यावज्जीवन सम्बन्धी व्रतों के साथ निर्देश नहीं आया। इसी प्रकार प्रतीत होता है आनन्द ने उस समय दिग्व्रत भी अङ्गीकार नहीं किया था। इस व्रत का मुख्य सम्बन्ध विदेशों में जाकर व्यापार करने वाले सार्थवाह आदि अथवा सैनिक अभियान करने वाले राजाओं के साथ है। आनन्द के पास यद्यपि सामान ढोने एवं यात्रा के लिए बैलगाड़ियां तथा नौकाएं भी थीं। फिर भी इस प्रकार का कोई निर्देश नहीं मिलता कि वह सार्थवाह के रूप में स्वयं व्यापार करने के लिए विदेशों में ज़ाया करता है। अतः सम्भव है इस व्रत की तत्काल आवश्यकता न प्रतीत हुई हो। .. यहाँ टीकाकार के निम्नलिखित शब्द हैं—“दिग्वतं शिक्षाव्रतानि च यद्यपि पूर्वं नोक्तानि, तथापि तत्र तानि द्रष्टव्यानि। अतिचारभणनस्यान्यथा निरवकाशता स्यादिहेति। कथमन्यथा प्रागुक्तं “दुवालसविहं सावयधम्म पड़िवज्जिस्सामि" इति, कथं वा वक्ष्यति “दुवालसविहं सावगधम्म पडिवज्जइ” इति। अथवा सामायिकादीनामित्वरकालीनत्वेन प्रतिनियतकालकरणीयत्वान्न तदैव तान्यसौ प्रतिपन्नवान्, दिग्व्रतं च विरतेरभावाद्। उचितावसरे तु प्रतिपत्स्यत इति भगवतस्तदतिचारवर्जनोपदेशनमुपपन्नम्। यच्चोक्तं 'द्वादशविधं गृहिधर्मं प्रतिपत्स्ये' यच्च वक्ष्यति "द्वादशविधं श्रावकधर्मं प्रतिपद्यते", तद्यथाकालं तत्करणाभ्युपगमादनवद्यमवसेयमिति।" इसका भाव यह है कि दिग्वत तथा शिक्षाव्रत यद्यपि पहले नहीं कहे गए, फिर भी उनका वहाँ अनुसंधान कर लेना चाहिए। अन्यथा यहाँ अतिचारों का प्रतिपादन निरर्थक हो जाएगा। इसके बिना पूर्वोक्त “मैं बारह प्रकार के श्रावकधर्म को स्वीकार करूँगा' तथा आगे कहा जाने वाला “बारह प्रकार के श्रावक धर्म को स्वीकार किया' ये कथन संगत नहीं होते। अथवा सामायिक आदि व्रत मर्यादित काल के लिए होते हैं और उन्हें उपयुक्त नियत समय पर ही ग्रहण किया जाता है। अतः उस समय उन्हें ग्रहण नहीं किया। इसी प्रकार विरति का अभाव होने के कारण दिग्व्रत भी उस समय ग्रहण नहीं किया गया। फिर भी भविष्यकाल में ग्रहण करेगा, इस लिए उक्त व्रतों के अतिचारों का निरूपण करना भगवान् ने आवश्यक समझा। ऐसी स्थिति में जो यह कहा गया कि 'बारह प्रकार के श्रावक धर्म को स्वीकार करूँगा' अथवा आगे आने वाला कथन कि 'उसने बारह प्रकार के श्रावक धर्म श्री उपासक दशांग सूत्रम् / 121 / आनन्द उपासक, प्रथम अध्ययन
SR No.004499
Book TitleUpasakdashang Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2003
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_upasakdasha
File Size9 MB
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