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________________ कहा जाता है। भगवान् महावीर स्वामी नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव इन चारों गतियों का अन्त कर संपूर्ण विश्व पर अपना अहिंसा और सत्य आदि का धर्मराज्य स्थापित करते हैं। अथवा-दान, शील, तप और भावरूप चतुर्विध धर्म की साधना स्वयं अन्तिम कोटि तक करते हैं और जनता को भी इस धर्म का उपदेश देते हैं अतः वे धर्म के वरचतुरन्तचक्रवर्ती कहलाते हैं। अथवा-जिस प्रकार सब चक्रवर्ती के अधीन होते हैं, चक्रवर्ती के विशाल साम्राज्य में ही सब राजाओं का राज्य अन्तर्गत हो जाता है अर्थात् अन्य राजाओं का राज्य चक्रवर्ती के राज्य का ही एक अंश होता है, उसी प्रकार संसार के समस्त धर्मतत्त्व भगवान् के तत्त्व के नीचे आ गए हैं। भगवान् का अनेकान्त तत्त्व चक्रवर्ती के विशाल साम्राज्य के समान है और अन्य धर्मप्ररूपकों के तत्त्व एकान्तरूप होने के कारण अन्य राजाओं के समान हैं। सभी एकान्तरूप धर्मतत्व अनेकान्त तत्त्व के अन्तर्गत हो जाते हैं। इसीलिए भगवान् को धर्म का श्रेष्ठ चक्रवर्ती कहा गया है। २७-द्वीप, त्राण, शरण, गति, प्रतिष्ठा-द्वीप टापू को कहते हैं, अर्थात् संसारसागर में नानाविध दुःखों की विशाल लहरों के अभिघात से व्याकुल प्राणियों को भगवान् सान्त्वना प्रदान करने के कारण द्वीप कहे गए हैं। अनर्थों-दुःखों के नाशक को त्राण कहते हैं। धर्म और मोक्षरूप अर्थ का सम्पादन करने के कारण भगवान् को शरण कहा गया है। दुःखियों के द्वारा सुख की प्राप्ति के लिए जिस का आश्रय लिया जाए उसे गति कहते हैं। प्रतिष्ठा शब्द "-संसाररूप गर्त में पतित प्राणियों के लिए जो आधाररूप है-" इस अर्थ का परिचायक है। दुःखियों को आश्रय देने के कारण गति और उन का आधार होने से भगवान् को प्रतिष्ठा कहा गया है। मूल में भगवया इत्यादि पद तृतीयान्त प्रस्तुत हुए हैं, जब कि दीवो इत्यादि पद प्रथमान्त / ऐसा क्यों है ? यह प्रश्न उत्पन्न होना अस्वाभाविक नहीं है, परन्तु औपपातिकसूत्र में वृत्तिकार अभयदेव सूरि ने-नमोऽथु णं अरिहन्ताणं भगवन्ताणं-इत्यादि षष्ठ्यन्त पदों में पढ़े गए-दीवो ताणं सरणं गई पइट्टा-इन प्रथमान्त पदों की व्याख्या में-दीवो ताणं सरणं गई पइट्ठा इत्यत्र जे तेसिं नमोऽत्थु णमित्येवं गमनिका कार्येति- इस प्रकार लिखा है। अर्थात् वृत्तिकार के मतानुसार-दीवो ताणं सरणं गई पइट्ठा-ऐसा ही पाठ उपलब्ध होता है और उस के अर्थसंकलन में-जे तेसिं नमोऽत्थु णं-(जो द्वीप, त्राण, शरण, गति और प्रतिष्ठा रूप हैं उन को नमस्कार हो), ऐसा अध्याहारमूलक अन्वय किया है। प्रस्तुत में जो प्रश्न उपस्थित हो रहा है, वह भी वृत्तिकार की मान्यतानुसार-दीवो ताणं सरणं गई पइट्ठा, इत्यत्र जो तेण त्ति(जो द्वीप, त्राण, शरण, गति तथा प्रतिष्ठा रूप है, उस ने) इस पद्धति से समाहित हो जाता है। 776 ] श्री विपाक सूत्रम् / दशम अध्याय [प्रथम श्रुतस्कन्ध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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