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________________ अध्ययन में मृगापुत्र का संसार-भ्रमण प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार अंजूश्री के जीव, का भी समझ लेना चाहिए। अंजूश्री और मृगापुत्र के जीव का शेष संसारभ्रमण समान है, ऐसा बोधित करना सूत्रकार को इष्ट है, तथा मृगापुत्र का संसारभ्रमण पूर्व के प्रथम अध्ययन में वर्णित हो चुका है। प्रश्न-सूत्रकार ने प्रत्येक स्थान पर "संसारो जहा पढमो"-का उल्लेख कर के सब का संसारभ्रमण समान ही बताया है, तो क्या सब के कर्म एक समान थे? क्या कर्मबन्ध के समय उन के अध्यवसाय में कोई विभिन्नता नहीं थी ? उत्तर-सामान्यरूप से तो यह सन्देह ठीक मालूम देता है, परन्तु यदि कुछ गम्भीरता से विचार किया जाए तो इस का समाहित होना कुछ कठिन नहीं है। आगमों में लिखा है कि संसार में अनन्त आत्माएं हैं। किसी का कर्ममल भिन्न तथा किसी का अभिन्न साधनों में संगृहीत होता है, इसी प्रकार कर्मफल भी भिन्न और अभिन्न दोनों रूप से मिलता है। मान लो-दो आदमियों ने जहर खाया तो उन को फल भी बराबर सा हो यह आवश्यक नहीं, क्योंकि विष किसी के प्राणों का नाशक होता है और किसी का घातक नहीं भी होता। सारांश यह है कि कर्मगत समानता होने पर भी फलजनक साधनों में भिन्नता हो सकती है। जैसा-जैसा कर्म होगा, वैसा-वैसा फल होगा। कई बार एक ही स्थान मिलने पर फल भिन्न-भिन्न होता है। जैसे-अनेकों अपराधी हैं किन्तु दण्ड-विभिन्न होने पर भी स्थान एक होता है, जिसे कारागार जेल के नाम से पुकारा जाता है। इसी तरह जीवों का संसारभ्रमण एक सा होने पर भी फल भिन्न-भिन्न हो तो इस में कौन सी आपत्ति है ? अथवा-जो बराबर के कर्म करने वाले हैं तो उन का संसारभ्रमण तथा फल भी बराबर होगा। इस सूत्र में उन आत्माओं का वर्णन है जिन्होंने भिन्न-भिन्न कर्म किए हैं, और उन का दण्ड भी भिन्न-भिन्न है परन्तु स्थान अर्थात् संसार एक है। तभी तो यह वर्णन किया है कि संसारभ्रमण के अनन्तर कोई महिष बनता है, कोई मृग तथा कोई मोर और कोई हंस बनता है। इसी तरह मच्छ और शूकर आदि का भी उल्लेख है। तब यदि दण्डगत भिन्नता न होती तो महिष आदि विभिन्न रूपों में उल्लेख कैसे किया जाता ? इसलिए सूत्र में उल्लेख की गई संसारभ्रमण की समानता स्थानाश्रित है जोकि युक्तियुक्त और आगमसम्मत है। तात्पर्य यह है कि सूत्रकार के उक्त कथन से परिणामगत विभिन्नता को कोई क्षति नहीं पहुँचती।। अंजूश्री का जीव वनस्पतिकायगत कटुवृक्षों तथा कटुदुग्ध वाले अर्कादि पौधों में लाखों बार जन्म-मरण करने के अनन्तर सर्वतोभद्र नगर में मोर के रूप में अवतरित होगा। 1. देखो-श्री भगवतीसूत्र शतक 29, उद्देश० 1 / / 770 1 श्री विपाक सूत्रम् / दशम अध्याय [प्रथम श्रुतस्कन्ध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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