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________________ का सारा वृत्तान्त अक्षरशः वही है जो वैश्रमणदत्त के वर्णन में आ चुका है। केवल नामों में अन्तर है। वहां देवदत्ता यहां अंजूश्री, वहां दत्त यहां धनदेव एवं वहां वैश्रमण दत्त और यहां विजय नरेश है। इसके अतिरिक्त वैश्रमणदत्त और विजयमित्र की याचना में कुछ अन्तर है। वैश्रमणदत्त ने तो देवदत्ता को पुत्रवधू के रूप में मांगा था जब कि विजयमित्र अंजूश्री की याचना महाराज कनकरथ के प्रधानमन्त्री तेतलि कुमार की भान्ति भार्यारूप से अपने लिए कर रहे हैं। तदनन्तर अजूश्री के साथ विजय नरेश का पाणिग्रहण हो जाता है और दोनों मानवसम्बन्धी उदार विषयभोगों का उपभोग करते हुए सानन्द जीवन व्यतीत करने लगे। __-गणिया वण्णओ-यहां पठित -वर्णक- पद का अर्थ है-वर्णनप्रकरण, अर्थात् गणिका-सम्बन्धी वर्णन पहले किया जा चुका है। इस बात को सूचित करने के लिए सूत्रकार ने -वण्णओ-इस पद का प्रयोग किया है। प्रस्तुत में इस पद से संसूचित-होत्था, अहीण. जाव सुरूवा बावत्तरीकलापंडिया-से लेकर-आहेवच्चं जाव विहरति-यहां तक के पाठ का अर्थ द्वितीयाध्याय में लिखा जा चुका है। राईसर जाव प्पभियओ तथा-चुण्णप्पओगेहि य जाव अभिओगित्ता-यहां पठित प्रथम-जाव-यावत् पद-तलवरमाडम्बियकोडुम्बियइब्भसेट्ठिसत्थवाह-इन पदों का तथा द्वितीय जाव-यावत् पद-हियउड्डावणेहि य निण्हवणहि य पण्हवणेहि य वसीकरणहि य आभिओगिएहि य-इन पदों का परिचायक है। तलवर-आदि शब्दों का अर्थ तथाहियउड्डावणेहि-इत्यादि पदों का अर्थ तथा-एयकम्मा ४-यहां के अङ्क से अभिमत पाठ द्वितीय अध्ययन में दिए जा चुके हैं। अन्तर मात्र इतना है कि वहां ये एक पुरुष के विशेषण हैं, जब कि प्रस्तुत में एक स्त्री के। लिंगगत भिन्नता के अतिरिक्त अर्थगत कोई भेद नहीं है। 1. तेतलिपुत्र या तेतलि कुमार का वृत्तान्त "ज्ञाताधर्मकथाङ्ग" नाम के छठे अंग के 14 वें अध्ययन में वर्णित हुआ है। उस का प्रकृतोपयोगी सारांश इस प्रकार है - तेतलि कुमार तेतलिपुर नगर के अधिपति महाराज कनकरथ का प्रधानमंत्री था, जो कि राजकार्य के संचालन में निपुण और नीतिशास्त्र का परममर्मज्ञ था। उस के नीतिकौशल्य ने ही उसे प्रधानमंत्री के सुयोग्य पद पर आरूढ़ होने का समय दिया था। उसी तेतलिपुर नगर में कलाद नाम का एक सुवर्णकार (सुनार) रहता था जो कि धनसम्पन्न और बुद्धिमान् था, परन्तु तेतलिपुर में उस की "मूषिकाकार दारक" के नाम से प्रसिद्धि थी। उस की स्त्री का नाम भद्रा था। भद्रा भी स्वभाव से सौम्य और पतिपरायणा थी। इन के पोटिला नाम की एक रूपवती कन्या थी। जन्म से लेकर युवावस्था पर्यन्त पोट्टिला का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा आदि का प्रबन्ध भी योग्य धायमाताओं द्वारा सम्पन्न हुआ था। वह भी रूपलावण्य और शारीरिक सौन्दर्य में अपूर्व थी। इस के आगे का अर्थात् उन्नत महल के झरोखे में दासियों के साथ कंदुकक्रीड़ा करना, और प्रधान मंत्री तेतलि कुमार का उसे देखना एवं निजार्थ याचना करना अर्थात् उसे अपने लिए मांगना आदि संपूर्ण वृत्तान्त पूर्व वर्णित वैश्रमणदत्त या विजयमित्र की तरह ही उल्लेख किया है। अधिक के जिज्ञासु ज्ञाताधर्मकथाङ्ग सूत्र में ही उक्त कथासंदर्भ का अवलोकन कर सकते हैं। प्रथम श्रुतस्कंध] श्री विपाक सूत्रम् / दशम अध्याय [761
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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