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________________ -आमंतेति जाव सक्कारेति-यहां के पठित जाव-यावत् पद से इसी अध्याय में पीछे पढ़े गए-अहाते जाव पायच्छित्ते, सुहासणवरगते-से लेकर-जाव अलंकारेणं-यहां तक के पदों का ग्रहण करना सूत्रकार को अभिमत है तथा-मित्त जाव परिजणं-यहां के जाव-यावत् पद से-णाइ-णियगसयण-संबन्धि-इन पदों का ग्रहण करना चाहिए। प्रस्तुत में युवराज पुष्यनन्दी का देवदत्ता के साथ विवाह बड़े समारोह से सम्पन्न हुआ, यह वर्णन किया गया है। तदनन्तर क्या हुआ, अब सूत्रकार उस का वर्णन करते हैं मूल-तते णं से पूसणंदिकुमारे देवदत्ताए दारियाए सद्धिं उप्पिं पासायवरगते फुट्टमाणेहिं मुयंगमत्थएहिं बत्तीसइबद्धनाडएहिं जाव विहरइ। तते णं से वेसमणे राया अन्नया कयाइ कालधम्मुणा संजुत्ते। नीहरणं जाव राया जाए पूसणंदी। तते णं से पूसणंदी राया सिरीए देवीए मायाभत्ते यावि होत्था। कल्लाकल्लिंजेणेव सिरी देवी तेणेव उवागच्छइ 2 त्ता सिरीए देवीए पायवडणं करेति। सतपागसहस्सपागेहिं तेल्लेहिं अब्भंगावेति। अट्ठिसुहाए मंससुहाए तयासुहाए रोमसुहाए चउव्विहाए संवाहणाए संवाहावेति।सुरहिणा गंधवट्टएणं उव्वट्टावेति 2 त्ता तिहिं उदएहिं मज्जावेति, तंजहा-उसिणोदएणं सीओदएणं गंधोदएणं।विउलं असणं 4 भोयावेति।सिरीए देवीए ण्हायाए जाव पायच्छित्ताए जाव जिमियभुत्तुत्तरागयाए ततो पच्छा पहाति वा भुंजति वा उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरति। ___ छाया-ततः स पुष्यनन्दिकुमारो देवदत्तया दारिकया सार्द्धमुपरि प्रासादवरगतः स्फुट्यमानैः मृदंगमस्तकैः द्वात्रिंशद्बद्धनाटकैः यावद् विहरति / ततः स वैश्रमणो राजा अन्यदा कदाचित् कालधर्मेण संयुक्तः निस्सरणं यावद् राजा जातः पुष्यनन्दी। ततः स पुष्यनन्दी राजा श्रियो देव्याः मातृभक्तश्चाप्यभवत् कल्याकल्यि यत्रैव श्रीदेवी तत्रैवोपागच्छति 2, श्रियो देव्याः पादपतनं करोति, शतपाकसहस्रपाकाभ्यां तैलाभ्यामभ्यंगयति / अस्थिसुखया मांससुखया त्वक्सुखया रोमसुखया चतुर्विधया संवाहनया संवाहयति। सुरभिणा गन्धवर्तकेनोद्वर्तयति 2 त्रिभिरुदकैर्मज्जयति, तद्यथा-उष्णोदकेन, शीतोदकेन, गंधोदकेन।विपुलमशनं भोजयति, श्रियां देव्यां स्नातायां यावत् प्रायश्चित्तायां यावत् जिमितभुक्तोत्तरागतायां ततः पश्चात् स्नाति वा भुंक्ते वा उदारान् मानुष्यकान् भोगभोगान् भुंजानो विहरति। 728 ] श्री विपाक सूत्रम् / नवम अध्याय [प्रथम श्रुतस्कंध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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