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________________ एक कम। पंचमाइसयाणं-पांच सौ माताओं को। कूडागारसालं-कूटाकारशाला में। आवसह-रहने के , लिए स्थान। दलयति-दिलवाता है। तते णं-तदनन्तर। से-वह। सीहसेणे-सिंहसेन। राया-राजा। कोडुंबियपुरिसे-कौटुम्बिक पुरुषों-अनुचरों को। सद्दावेति सद्दावित्ता-बुलाता है, बुलाकर। एवं वयासीइस प्रकार कहने लगा। देवाणुप्पिया!-हे भद्रपुरुषो ! तुब्भे-तुम। गच्छह णं-जाओ। विउलं-विपुल। असणं ४-अशनादि / उवणेह-ले जाओ, तथा। सुबहुं-अनेकविध। पुष्फ-पुष्प। वत्थ-वस्त्र / गंध-गंधसुगन्धित पदार्थ। मल्लालंकारं च-और माला तथा अलंकार को। कूडागारसालं-कूटाकारशाला में। साहरह-ले जाओ। तते णं-तदनन्तर / ते-वे। कोडुंबियपुरिसा-कौटुम्बिक पुरुष। तहेव-तथैव-आज्ञा के अनुसार। जाव-यावत्। साहरंति-ले जाते हैं अर्थात् कूटाकारशाला में पहुंचा देते हैं। तते णं-तदनन्तर। तासिं-उन। एगूणगाणं-एक कम। पंचण्हं देवीसयाणं-पांच सौ देवियों की। एगूणगाई-एक कम। पंचमाइसयाई-पांच सौ माताएं। सव्वालंकारविभूसियाई-सम्पूर्ण अलंकारों से विभूषित हुईं। तं-उस। विउलं-विपुल। असणं ४-अशनादिक तथा। सुरं च 6-6 प्रकार की सुरा आदि मदिराओं का। आसादेमाणाई ४-आस्वादनादि करती हुईं। गंधव्वेहि य-गान्धर्वो-गायक पुरुषों तथा। नाडएहि यनाटकों-नर्तक पुरुषों द्वारा / उवगिजमाणाइं-उपगीयमान अर्थात् गान की गईं। विहरन्ति-विहरण करती हैं। तते णं-तदनन्तर। से-वह। सीहसेणे राया-महाराज सिंहसेन / अड्ढरत्तकालसमयंसि-अर्द्धरात्रि के समय। बहूहि-अनेक। पुरिसेहि-पुरुषों के। सद्धिं-साथ। संपरिवुडे-घिरा हुआ। जेणेव-जहां। कूडागारसाला-कूटाकारशाला थी। तेणेव-वहां पर। उवागच्छति उवागच्छित्ता-आता है, आकर। कूडागारसालाए-कूटाकारशाला के। दुवाराई-द्वारों-दरवाजों को। पिहेति पिहित्ता-बन्द करा देता है, बन्द करा कर। कूडागारसालाए-कूटाकारशाला के। सव्वतो समंता-नारों तरफ से। अगणिकायंअग्निकाय-अग्नि। दलयति-लगवा देता है। तते णं-तदनन्तर। तासिं-उन। एगूणगाणं-एक कम। पंचण्हं देवीसयाणं-पांच सौ देवियों की। एगूणगाई-एक कम। पंचमाइसयाई-पांच सौ माताएं। सीहसेणेणं-सिंहसेन / रण्णा-राजा के द्वारा / आलीवियाई समाणाई-आदीप्त की गईं अर्थात् जलाई गईं। रोयमाणाई ३-रुदन, आक्रन्दन और विलाप करती हुईं। अत्ताणाई-अत्राण-जिस का कोई रक्षा करने वाला न हो, और। असरणाई-अशरण-जिसे कोई शरण देने वाला न हो। कालधम्मुणा-कालधर्म से। संजुत्ताइं-संयुक्त हुईं। ततेणं-तदनन्तर / से-वह / सीहसेणे-सिंहसेन। राया-राजा। एयकम्मे ४-१एतत्कर्मा, एतत्प्रधान, एतद्विद्य और एतत्समाचार होता हुआ। सुबई-अत्यधिक। पावं कम्म-पाप कर्म को। समज्जिणित्ता-उपार्जित कर के। चोत्तीसं-३४। वाससयाई-सौ वर्ष की। परमाउं-परमायु। पालइत्ताभोग कर। कालमासे-काल मास में। कालं किच्चा-काल कर के। छट्ठीए-छठी। पुढवीए-पृथिवीनरक में। उक्कोसेणं-उत्कृष्ट-अधिकाधिक। बावीससागरोवमट्ठिइएसु-बाईस सागरोपम स्थिति वाले। नेरइएसु-नारकियों में। नेरइयत्ताए-नारकीय रूप से। उववन्ने-उत्पन्न हुआ। / मूलार्थ-तत्पश्चात् वह सिंहसेन राजा किसी अन्य समय पर एक कम पांच सौ देवियों की एक कम पांच सौ माताओं को आमंत्रित करता है। तब सिंहसेन राजा से आमंत्रित हुईं वे एक कम पांच सौ देवियों की एक कम पांच सौ माताएं सर्व प्रकार के 1. एतत्कर्मा, एतत्प्रधान आदि पदों का अर्थ द्वितीय अध्याय में लिखा जा चुका है। . 704 ] श्री विपाक सूत्रम् / नवम अध्याय [प्रथम श्रुतस्कंध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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