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________________ नही हुई। ताहे-तब। संता-श्रान्त-थकी हुई। तंता-मन से दुःखित हुई। परितन्ता-शारीरिक और मानसिक खेद से खिन्न हुई। अकामिया-अभिलाषा रहित हुई। असयंवसा-विवश-परतन्त्र हुई। तं गब्भं-उस गर्भ को। दुहं-दुहेणं-अत्यन्त दुःख से। परिवहति-धारण करती है अर्थात् धारण करने की इच्छा न होते हुए भी विवश होती हुई धारण कर रही है। मूलार्थ-तदनन्तर किसी काल में मध्य रात्रि के समय कुटुम्ब-चिन्ता से जागती हुई उस मृगादेवी के हृदय में यह संकल्प-विचार उत्पन्न हुआ कि मैं पहले तो विजय नरेश को इष्ट-प्रिय, ध्येय-चिन्तनीय, विश्वास-पात्र और सम्माननीय थी परन्तु जब से मेरे उदर में यह गर्भस्थ जीव गर्भरूप से उत्पन्न हुआ है तब से विजय नरेश को मैं अनिष्ट यावत् अप्रिय लगने लग गई हूं। इस समय विजय नरेश तो मेरे नाम तथा गोत्र का भी स्मरण करना नहीं चाहते, तो फिर दर्शन और परिभोग-भोगविलास की तो आशा ही क्या है ? अतःमेरे लिए यही उपयुक्त एवं कल्याणकारी है कि मैं इस गर्भ को गर्भपात के हेतुभूत अनेक प्रकार की शातना (गर्भ को खण्ड-खण्ड कर के गिरा देने वाले प्रयोग) पातना (अखंडरूप से गर्भ को गिरा देने वाले प्रयोग) गालना (गर्भ को द्रवीभूत करके गिराने वाला प्रयोग) और मारणा (मारने वाला प्रयोग) द्वारा गिरा दूं-नष्ट कर दूं। वह इस प्रकार विचार करती है और विचार कर गर्भपात में हेतुभूत क्षारयुक्त-खारी कड़वी, और कसैली औषधियों का भक्षण तथा पान करती हुई उस गर्भ को गिरा देना चाहती है। अर्थात् शातना आदि उक्त उपायों से गर्भ को नष्ट कर देना चाहती है। परन्तु वह गर्भ उक्त उपायों से भी नाश को प्राप्त नहीं हुआ।जब वह मृगादेवी इन पूर्वोक्त उपायों से उस गर्भ को नष्ट करने में समर्थ नहीं हो सकी तब शरीर से श्रान्त, मन से दुःखित तथा शरीर और मन से खिन्न होती हुई इच्छा न रहते हुए विवशता के कारण अत्यन्त दुःख के साथ उस गर्भ को धारण करने लगी। टीका-परितपरायणा साध्वी स्त्री के लिए संसार में अपने पति से बढ़ कर कोई भी वस्तु इष्ट अथवा प्रिय नहीं होती। पतिदेव की प्रसन्नता के सन्मुख वह हर प्रकार के सांसारिक प्रलोभन को तुच्छ समझ कर ठुकरा देती है। उस की दृष्टि में पतिप्रेम का सम्पादन करना ही उसके जीवन का एकमात्र ध्येय होता है, अतः पतिप्रेम से शून्य जीवन को वह एक प्रकार का अनावश्यक बोझ समझती है। जिस को उठाए रखना उसके लिए असह्य हो जाता है। यही दशा पतिव्रता मृगादेवी की हुई जब कि उसने अपने आपको पतिप्रेम से वंचित पाया। कुछ समय पहले उसके पतिदेव का उस पर अनन्य अनुराग था। वे उसे गृहलक्ष्मी समझकर उसका हार्दिक स्वागत किया करते और उसकी आदर्श सुन्दरता पर सदा मुग्ध रहते / इसके अतिरिक्त हर एक सांसारिक और धार्मिक काम-काज में उसकी सम्मति लेते तथा उसकी सम्मति के अनुसार ही 190 ] श्री विपाक सूत्रम् / प्रथम अध्याय [प्रथम श्रुतस्कंध
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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