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________________ समणेणं-श्रमण भगवान् महावीर ने। के अट्ठ-क्या अर्थ। पण्णत्ते-कथन किया है। तते णं-तदनन्तर / से सुहम्मे-अणगारे-वह सुधर्मा अनगार। जंबु अणगारं-जम्बू अनगार को। एवं-इस प्रकार। वयासीकहने लगे। जम्बू !-हे जम्बू! खलु-निश्चयार्थक है। एवं-इस प्रकार। मूलार्थ-हे भगवन् ! प्रश्नव्याकरण नामक दशम अंग के अनन्तर मोक्षसम्प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने विपाकश्रुत नामक एकादशवें अंग का क्या अर्थ फरमाया है ? तदनन्तर आर्य सुधर्मा अनगार ने जम्बू अनगार के प्रति इस प्रकार कहा-हे जम्बू! मोक्ष सम्प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने विपाकश्रुत नामक एकादशवें अंग के दो श्रुतस्कन्ध प्रतिपादन किए हैं, जैसे कि-दुःखविपाक और सुखविपाक। हे भगवन् ! यदि मोक्षसंप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने एकादशवें विपाकश्रुत नामक अंग के दो श्रुतस्कन्ध फरमाये हैं, जैसे कि दुख:विपाक और सुखविपाक, तो हे भगवन् ! दुःख-विपाक नामक प्रथम श्रुतस्कन्ध में श्रमण भगवान् महावीर ने कितने अध्ययन कथन किए हैं ? तदनन्तर इसके उत्तर में आर्य सुधर्मा अनगार जम्बू अनगार के प्रति इस प्रकार कहने लगे-हे जम्बू! मोक्षसंप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने दुःखविपाक नामक प्रथम श्रुतस्कन्ध के दश अध्ययन प्रतिपादन किए हैं जैसे कि-मृगापुत्र (1) उज्झितक (2) अभग्न (3) शकट (4) बृहस्पति (5) नन्दी (6) उम्बर (7) शौरिकदत्त (8) देवदत्ता (9) और अञ्जू (10) / हे भगवन् ! मोक्षसम्प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने दुःखविपाक के मृगापुत्र आदि दश अध्ययनों में से प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कथन किया है ? उत्तर में सुधर्मा अनगार कहने लगे-हे जम्बू ! उसका अर्थ इस प्रकार कथन किया है। ____टीका-श्री जम्बू स्वामी ने अपने सद्गुरु श्री सुधर्मा स्वामी की पर्युपासना-सेवा करते हुए बड़े विनम्र भाव से उन के श्री चरणों में निवेदन किया कि हे भगवन् ! श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने प्रश्नव्याकरण नाम के दशवें अंग का जो अर्थ प्रतिपादन किया है वह तो मैंने आपके श्रीमुख से सुन लिया है, अब आप यह बताने की कृपा करें कि उन्होंने विपाकश्रुत नाम के ग्यारहवें अंग का क्या अर्थ कथन किया है। जम्बू स्वामी के इस प्रश्न में विपाकश्रुत नाम के ग्यारहवें अंग के विषय को अवगत करने की जिज्ञासा सूचित की गई है, जिस के अनुरूप ही उत्तर दिया गया है। "विपाकश्रुत" का सामान्य अर्थ है-विपाक-वर्णन-प्रधान शास्त्र / पुण्य और पापरूप कर्म के फल को विपाक कहते हैं, उस के प्रतिपादन करने वाला श्रुत-शास्त्र विपाकश्रुत कहलाता है। सारांश यह है कि जिस में शुभाशुभ कर्मफल का विविध प्रकार से वर्णन किया गया हो उस शास्त्र या आगम को विपाकश्रुत कहा जाता है। प्रथम श्रुतेस्कंध ] श्री विपाक सूत्रम् / प्रथम अध्याय [117
SR No.004496
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Shivmuni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2004
Total Pages1034
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size21 MB
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