SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 517
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ऽङ्कः] 33. अभिनवराजलक्ष्मी-भाषाटीका-विराजितम् 513 - (ततः प्रविशति मातलिः)। मातलि:--दिष्टया धर्मपत्नीसमागमेन, पुत्रमुखदर्शनेन च आयुमान्वर्द्धते। राजा-अभूत्सम्पादितस्वादुफलो मे भनोरथः / मातले! न खलु विदितोऽयमाखण्डलस्याऽर्थः स्यात् ? / __मालि:-( सस्मितम्-) किमीश्वराणां परोक्षम् ? / एहि भगवान् मारीचस्ते देर्शनं वितरति। राजा-प्रिये ! अवलम्ब्यतां पुत्रः। त्वां पुरस्कृत्य भगवन्तं द्रष्टुमिच्छामि। अस्य = अङ्गुलीयकस्य / [ 'परिभाषणं' नाम सन्ध्यङ्गमत्र ] / दृष्टया = भागधेयेन / 'दैवं दिष्टं भागधेय'मित्यमरः / वर्द्धते = शोभते / (आपको बधाई है)। [प्रथनं नाम सन्ध्यङ्गमेतत् , मातलिप्रवेशात् / __सम्पादितं-निष्पन्न स्वादुफलं यस्यासौ-सम्पादितस्वादुफल: सञ्जातमधुरफलः। मनोरथः = अभिलाषः / आखण्डलः = इन्द्रः / 'आखण्डलः सहस्राक्षः' इत्यमरः / ईश्वराणां = प्रभूणां / परोक्षम् = अविदितं / किं ? / न किमपीत्याशयः / दर्शनं वितरति = ददाति / अवलम्ब्यतां = स्वाङ्के गृह्यतां / त्वां पुरस्कृत्य = त्वामग्रे कृत्वा / [इन्द्र के सारथि-मातलि का प्रवेश] / मातलि-बड़े हर्ष की बात है, कि आप अपनी धर्मपत्नी को पाकर और अपने पुत्र के मुख को देखकर, आज हर्षान्वित हो रहे हैं। अतः आपको बधाई है। राजा–आज मेरे मनोरथ रूपी वृक्ष के यह मीठा फल लगा है / हे मातले ! भगवान् इन्द्र को तो यह बात कदाचित् अभी मालूम नहीं होगी ? / मातलि-(मुसकराकर ) ईश्वरों से क्या बात छिपी है ? / अर्थात् - उनको तो यह बात पहिले ही मालूम हो चुकी है। अच्छा, अब आइए! भगवान् मारीच ( कश्यप जी ) आपको अपने दर्शनों का अवसर दे रहे हैं / राजा-हे प्रिये ! अपने इस पुत्र ( बालक ) को गोद में लेकर मेरे साथ चलो। तुमको आगे करके (साथ ले करके) ही मैं भगवान् कश्यपजी के दर्शन करना चाहता हूँ। : 1 'दर्शनमिच्छति', 'दर्शनं यच्छति' पा० /
SR No.004487
Book TitleAbhigyan Shakuntalam Nam Natakam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahakavi Kalidas, Guruprasad Shastri
PublisherBhargav Pustakalay
Publication Year
Total Pages640
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy