________________ (60) 'जिन पूजामें लाभ है ऐसी प्ररूपणा जो अधिकता से करे और इस प्रकार स्वयं और दूसरे भद्रिक लोगों से फल, फूलों का श्रारम्भ करे तथा करावे तो दोनों को सम्यक्त्व बोध दुर्लभ हो जाता है। ___इत्यादि खण्डनात्मक कथन जिस महानिशीथ में है उस के सामने यह महाकल्प का प्रायश्चित विधान महाकाल्पनिक ही प्रतित होता है। ___ यद्यपि महानिशीथ और महाकल्प की नोंध नंदी सूत्र में है, तथापि यह ध्यान में रखना चाहिये कि सभी सूत्र अब तक ज्यों के त्यों मूलस्थिति में नहीं रहे हैं, इनमें बहुतसा अनिष्ठ परिवर्तन भी हुआ है। हमारे कितने ही ग्रन्थ तो आक्रमण कारी प्रातताईयों द्वारा नष्ट हो गये हैं। फिर भी जितने बचकर रहे वे भी एक लम्बे समय से (चैत्यवाद और चैत्यवास प्रधान समय से) मूर्ति पूजकों के ही हाथ में रहे / यद्यपि सूत्र के एक वर्ण विषयसि को भी अनंत संसार का कारण बताया गया है, तथापि धर्म के नाम पर वैभव विलास के इच्छुक महाशयों ने सूत्रों के पाठों में परिवर्तन और नूतन प्रक्षेप करने में कुछ भी न्यूनता नहीं रक्खी / इस विषय में मात्र एक दो प्रमाण यहां दिये जाते हैं, देखिये (1. मूर्ति-पूजक विजयानन्दसूरि स्वयं 'जैन तत्वादर्श पृष्ट 585 पर लिखते हैं कि विजयदान सूरि ने एकादशांग अनेक बार शुद्ध किये। (2) पुनः पृष्ठ 312 पर लिखते हैं कि