________________ (51) (ग) भागवत पुराण स्कन्ध 3 अध्याय 26 में-- 'प्रहंकार स्त तो रुद्रश्चित्तं चैत्य स्तनोऽभवत्' अर्थात्- अहंकार से रूद्र, रूद्र से चित्त, चित्त से चैत्य अर्थात--प्रात्मा हुआ। चैत्य शब्द का मंदिर व मूर्ति यह अर्थ प्राचीन नहीं किंतु आधुनिक समय का है, ऐसा मूर्ति पूजक विद्वान पं० बेचरदासजी ने अनेक प्रबल प्रमाणों से सिद्ध किया है। ('देखो जैन साहित्यमा विकार थवाथी थयेली हानी' नामक निबन्ध ) ये लोग कब से और किस प्रकार मूर्ति अर्थ करने लगे हैं यह भी पण्डितजी ने स्पष्ट कर दिया है, इस निबन्ध को सम्यक प्रकार से पढ़कर अपने हठ को छोड़ना चाहिये। और यह पक्का निश्चय कर लेना चाहिये कि-धार्मिक विधि का विधान किसी के कथानक या शब्दों की ओर से नहीं किया जाता किन्तु खास शब्दों में किया जाता है। इत्यादि प्रमाणों पर से हम इन मूर्ति-पूजक बन्धुओं से यही कहते हैं कि-कृपया अभिनिवेश को छोड़कर शुद्ध हृदय से विचार करें और सत्य अर्थ को ग्रहण कर अपना कल्याण साधे /