________________ ( 46 ) कृपया तत्त्व निर्णय में तो हठ को छोड़ दीजिये, और फिर निम्न प्रमाण देखिये आपके ही मान्य ग्रन्थकार आपकी दो और तीन ही मनमाने अर्थ मानकर अन्य का लोप करने की वृत्ति को असत्य प्रमाणित कर रहे हैं___ खेमविजयजी गणि कल्पसूत्र पृ. 160 पंक्ति में 'वेयावत्तस्स चेइयस्स' का अर्थ व्यंतरर्नु मन्दिर लिखते हैं, यहां आपके किये अर्थों से यह अधिक अर्थ कहां से आगया ? __यदि आप लोग चैत्य शब्द से जिन मन्दिर और जिन मूर्ति ही अर्थ करते हैं तो समवायांग में दुःख विपाक की नोंध लेते हुए बताया गया है कि दुह विवागाणं णगराई उज्जाणाई चेईयाई / क्या इस मुल पाठ में आये हुए चैत्य शब्द का भी जिनमन्दिर या जिन मुर्ति अर्थ करेंगे ! नहीं वहां तो आप अन्य मन्दिर ही अर्थ करेंगे, क्योंकि-यदि वहां आपने उन दुखान्तविपाकों ( अनार्य, पापी, मलेच्छ, और हिंसकों ) के भी जिन मंदिर होना मान लिया तब तो इन जिन मंदिरों का कोई महत्व ही नहीं रहेगा और मिथ्यात्वी सम्यक्त्वी का भी भेद नहीं रहेगा, इसलिये वहां तो आप चट से व्यंतर का मंदिर ही अर्थ करेंगे, इससे आपके विजयानन्दजी के माने हुए तीन ही अर्थों के सिवाय अन्य चौथा अर्थ भी सिद्ध हुश्रा / आपके ही 'मूर्ति-मण्डन प्रश्नोत्तर' के लेखक पृ० 282 में प्रश्न व्याकरण के श्राश्रव द्वार में आये हुए चैत्य शब्द का अर्थ ( जोकि मनो कल्पित है) इस प्रकार करते हैं कि