________________ (17) दृसग-सूर्याभ की पूजी हुई प्रतिमा तीर्थकर प्रतिमा ही है इसमें कोई प्रमाण नहीं, कारण वहां बताई हुई प्रतिमाएं शास्वत है, जिसकी श्रादि और अन्त नहीं, और तीर्थकर शास्वत नहीं हो सकने ( यद्यपि तीर्थकरत्व शास्वत है किंतु अमुक तीर्थङ्कर शास्वत है यह नहीं हो सकता है क्योंकिवे जन्मे हैं इसलिये उनकी आदि और अन्त है, देवलोक में बताई हुई ऋषभ, बर्द्धमान, चन्द्रानन, वारिसेन इन चार माम वाली मूर्तिएं शास्वत होने से तीर्थङ्करों की नहीं हो सकती / यह तो देवताओं की परम्परा से चली आती हुई कुल, गौत्र, या ऐसे ही किसी देव विशेष की मूर्ति हो सकती है, क्योंकि-जहां प्रतिमाओं का नाम है वहां पृथक 2 देवलोक में होते हुए भी सभी जगह उक्त चारों नाम वाली ही मूर्तिएं बताई गई है / यदि, ये मूर्तिएं तीर्थङ्करों की होती तो इन चार नामों के सिवाय अन्य नाम वाली और अशास्वती भी होनी चाहिये थी, हां. यदि तीर्थङ्कर केवल चार ही होते तब तो वे मूर्तिएं तीर्थंकर की कभी मानी भी जा सकती, किंतु तीर्थकर की संख्या हरएक काल-चक्र के दोनों विभागों में चौबीस से कम नहीं होती, अतएव देवलोक की मूर्तिएं तीर्थंकरों की होना सिद्ध नहीं हो सकती। - सूर्याभ के इस कृत्य को धार्मिक कृत्य कहने वालों को निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिये-- (अ) जिन प्रतिमा के साथ द्वार, तोरण, ध्वजा, पुष्करणी श्रादि को पूज कर सूर्याभ ने किस धर्म की आराधना