________________ ( 168 ) ___अब उक्त गाथा इन्हीं के मतानुयायी श्रावक भीमसी माणेक के छपवाये हुए 'पर्युषण पर्वनी कथाओ' नामक ग्रन्थ के पृ० 53 में इस प्रकार है आरम्भे नत्थी दया, महिला संगेण नासए : संकाए सम्मतं"....."पवज्जा प्रत्थगहणे // यद्यपि इस शुद्ध पाठ में भी अशुद्धि है किन्तु इससे यह तो सिद्ध हो गया कि मृति मण्डन कारने न जाने किस अभिप्राय से इस गाया के तीन चरण तोड़ कर उनकी जगह ये पद विठा दिये है। __ये तो इनके मिथ्या प्रयासों के कुछ नमूने मात्र हैं / अब थोड़ा सा अर्थ का अनर्थ करने के भी कुछ प्रमाण देखिये (1) आवश्यक सूत्र के लोगस्स के पाठ में आये हुए " महिया " शब्द का अर्थ फूलों से पूजा करने का लिखकर अनर्थ ही किया है। (2) निशीथ, बृहदूकल्प, व्यवहार, कल्प सूत्र आदि में आये हुए "विहार भूमिवा" शब्द का अर्थ स्थंडिल भूमि होता है, किन्तु इससे विरुद्ध " जिन मन्दिर " अर्थ कर इन्होंने यह भी एक अनय किया है। (3) सूत्रों में " जाए " शब्द आया है जिसका अर्थ " याग यज्ञ " होता है, जैन सिद्धांतों को भाव यज्ञ ही मान्य है, द्रव्य नहीं, प्रश्न व्याकरण में दया को यज्ञ कहा है, तथा भगवती सूत्र श०१८ उद्देशा 20 में सोमिल ब्राह्मण के प्रश्नों के उत्तर में प्रभु ने क्रोधादि के नाश को यज्ञ कहा है इसी प्रकार शाता धर्म कथांग अ० 4 में इन्द्रिय नो इन्द्रिय यज्ञ बताया है, इन सभी का भाव आत्मोत्थान रूप क्रियामों भाव यज्ञ-से ही