________________ ( 166) इस प्रकार श्री दर्शनविजयजी ने मून पाठ और पाठान्तर बताया है, हमारे विचार से तो यह पाठान्तर भी इच्छापूर्वक बनाकर लगाया है। __ श्रीमान् दर्शनविजयजी भी मूल पाठ में से एक शब्द खा गये और पाठान्तर का अर्थ भी मनमाना कर दिया। देखिये शुद्ध मूल पाठ आयारवन्त चेहय 'जुबइ विविह समिणविट्ट बहुला / इस छोटे से पाठ में से 'जुवइ' शब्द श्रीमान् दर्शनविजयजी ने क्यों उड़ाया / यह तो वे ही जानें, हमें तो यही विश्वास होता है कि यह शब्द जानबूझ कर ही उड़ाया गया है क्यों कि इस शब्द का टीकाकारने "युवति वेश्या" अर्थ किया है जो श्री दर्शन विजयजी को चैत्य के साथ होने से कुछ बुरा मालुम दिया होगा। किन्तु इस प्रकार मनमाना फेरफार करना यह तो प्रत्यक्ष में सैद्धान्तिक कमजोरी सिद्ध करता है। ___यहां एक यह भी विचारणीय बात है कि इनके आचार्यों को जब 'आयारवन्त चेइय' शब्द से जिन मन्दिर-मूर्ति अर्थ इष्ट नहीं था तभी तो इन लोगों ने पाठान्तर के बहाने यह नूतन पाठ बढ़ाया है / इस से यह सिद्ध हुआ कि-चैत्य शब्द का अर्थ जिन मन्दिर-मूर्ति नहीं होकर यक्षालय भी है। (6) ज्ञाताधर्म कथांग में द्रौपदी के सोलहवें अध्ययन में "रामोत्थुणं " आदि पाठ अधिक बढ़ाया हुआ है। इस प्रकार साहसिक महानुभावों ने अपने.मत की सिद्धि के लिए मूल में धूल मिलाकर जनता को बड़े भ्रम में डाल दिया है।