________________ (10) अमने तो तेमां तेमनी विषय लोलुपता तेमज स्वार्थान्धता जणाइ आवे छे' 'माटे ए जिनमूर्तिनो उपदेश आपनार नामधारी त्यागियो भोगियोनी अपेक्षाए वधारे पातकी सिद्ध थाय छे' 'श्रा आत्मारामजी महाराजना धर्मोपदेशनो नमुनो छ ? एमना अन्धश्रद्धालु भक्तो कदी पोतानी बुद्धि थी xxx विचारता नथी' 'ए गुरुवर्योए पोताना स्वार्थ पोषण तथा इन्द्रिय विषयोमे पूर्ण करवानो मार्ग काढ्यो छे" ___ "मा कलिकाल सर्वज्ञ तथा महान् प्राचार्यनी पदवी धारण करनार नामधारी जैन साधुओए केवी रीते पोताना साधुत्व ने लांछन लगाड्युं छे ? हेमचन्द्राचार्य, हतातो सर्वश? नहीं तो सर्वक्ष वगर भावी बात कोण कहे ? पक्षान्धता शुं नधी करावती" जैनधर्मना आत्मकल्याणकारी तीर्थो अने तीर्थ यात्रा माटे लेखक प्रा प्रमाणे लखे छे:___ "पहाड़ोमां रखड़ता, आत्मारामजीए पोते पण मूलमां धूल मेलवी ने अनन्त संसार परिभ्रमण करवा रूप फल प्राप्त कर्यु छे, मनमानी हांकी अर्थनो अनर्थ को छे, उत्तराध्ययन नियुक्तिकारे गौतम स्वामीने माटे साक्षात् प्रभुने छोड़ी पहाड़ोमां भटकवानुं लखी मार्यु" .. आवश्यक नियुक्तिकारे श्रावकोने मन्दिर बनावया, पूजा करवी वगैरे विषयोमा अडंगा लगाव्या' मूर्तिपूजक गुरुगरिष्ठ पं० न्यायविजयजी--न्यायनो खून करनार न्यायविजयजी' 'न्यायविजयजीए न्यायनुं खून कर्यु छ, श्रावी अभिनिवेशमां उन्मत्त व्यक्तियो' 'शुद्ध श्रद्धाथी पतित आत्मारामजी' 'मूर्तिपूजक बन्धुओ हमणा मूर्तिपूजा मानवा रूप उन्मार्ग पर छ।