________________ (126) हात्मा ही भोगियों को उपदेश देकर हमारी रक्षा का प्रयत्न करेंगे ऐसी अाशा थी किन्तु जब स्वयं त्यागी कहाने वाले भी कमर कसकर पुष्पों की अधिक 2 हिंसा करवा कर उम्र में धर्म बतावें, तब वे बेचारे कहां जावें ? किसकी शरण ले ? यह तो दुधारी तलवार चली, पहले तो भोगी लोग ही शत्रु थे, और अब तो त्यागी कि जिनसे रक्षा की श्राशा थी-वे भी शत्रु होगये। भोगी लेागों में से बहुत से तो फूलों को तोड़ने में हिंसा ही नहीं मानते, और कितने मानते हों तो वे भी अपने भोगों के लिए तोड़ते हैं, किन्तु उसमें धर्म तो नहीं मानते, पर आश्चर्य तो यह है कि-सर्व त्यागी पूर्ण अहिंसक कहाने वाले ये त्यागी लोग फूलों को तोड़ने तुड़वाने में हिंसा तो मानते हैं किन्तु इस हिंसा में भी धर्म दया) होने की-बिष को अमृत कहने रूप-प्ररूपणा करते हैं / इस पर से तो कोई भी सुज्ञ यह सोच सकता है कि-"अधिक पातकी कौन है? ये कहे जाने वाले त्यागी या भोगी ? पाप को पाप, झूठ को भूठ, खोटे को खोटा कहने वाला तो सच्चा सत्य वक्ता है, किन्तु पाप को पुण्य, झूठ को सत्य, खोटे को खरा, कहने वाले तो स्पष्ट सतरहवें पाप स्थान का सेवन ( जानबूझकर माया से भूठ बोलना ) करने के साथ अन्य जीवों को अठारहवें पाप स्थान में धकेलते हैं, और आप भी इसी अन्तिम प्रबल पाप स्थान के स्वामी बन जाते हैं / हजारों भद्र लोगों को भ्रम में डालकर मिथ्या युक्तियों द्वारा उनकी श्रद्धा को भ्रष्ट करने व उन्हें उन्मार्ग गामी बनाने वाले संसार में नाम घारी त्यागी लोग जितने हैं, उतने दूसरे नहीं।