________________ ( 73) किन्तु वही निशानेबाज लक्षित वस्तु को वेधने के लिये नि. शाना मारते समय अपने व लक्ष्य के बीच में कुछ दूसरी वस्तु ओट की तरह रख कर उसीकी ओर निशाना मारे या बीच में दिवाल खड़ी कर फिर निशाना चलावे तो उसका निशा. ना वह दिवाल रोक लेती है जिससे वह लक्ष्य भ्रष्ट हो जाता है, इसी प्रकार मूर्ति को सामने रख कर ध्यान करने वाले के लिये मूर्ति, दिवाल ( श्रोट) का काम करके ध्याता का ध्यान अपने से आगे नहीं बढ़ने देती। बिना मूर्ति के किया हुआ ध्यान ही अर्हत् सिद्ध रूप लक्ष्य तक पहुंच कर चित्त को प्रसन्न और शांत कर सकता है, अतएव ध्यान में मूर्ति की आवश्यकता नहीं है। __शास्त्रों में भरतेश्वर, नमिराज, समुद्रपाल आदि महापुरुषों का वर्णन प्राता है, वहां यह बताया गया है कि उन्होंने बिना इस प्रचलित जड़ मूर्ति के मात्र भावना से ही संसार छोड़ा और चारित्र स्वीकार कर आत्म कल्याण किया है, भरतेश्वर ने अनित्य भावना से केवलज्ञान प्राप्त किया किन्तु उन्हें किसी मूर्ति विशेष के बालंबन लेने की आवश्यकता नहीं हुई, अतएव ध्याता को ध्यान करने में मूर्ति की भावश्यकता है ऐसे कथन एक दम निस्सार होने से बुद्ध गम्य नहीं है। - - Mana RE R