________________ श्यङ् गमने प्यङ् वृद्धौ ष्ट्य स्त्यै सङ्घातशब्दयोः ष्णें तुः। वेष्टनके 3ङ् पालन इह कान्ताः फक्क नीचगतौ // 35 // तक हसने शुक गमने ककि लौल्ये बुक्क भाषणे हिक्की। अव्यक्तवाचि तकु कृच्छ्रजीवने सेचने शीकृङ् // 36 // देकृङ् धेकृङ् शब्दोत्साहेऽकुङ् लक्षणे शकुङ्. रेकृङ्। शङ्कार्थे कुकि वृकि तु ग्रहणार्थे दर्शने लोकृङ् // 37 // ककुङ् श्वकुङ् बकुङ् अकुङ् श्लकुङ् ष्वष्कि वस्कि मस्कि तिकि। ढौकृङ् त्रौकृङ् टीकृङ् स्रेकृङ् सेकृङ् टिकि गतौ स्युः॥ 38 // श्लोकङ् सङ्घातार्थे कौटिल्ये वकुङ् मकुङ् भूषायाम् / चकि तृप्तिप्रतिघातार्थयोर्द्वियुगविंशतिः खान्ताः // 39 // शाख श्लाख व्याप्तौ कक्ख हसे राख लाख ओखयुतः। द्राक्ष धाल विशोषालमर्थयोरुख णख नखश्रित् // 40 // वख मख रख लख मखु रखु लखु रिखु इख ईखु इखु गतौ गान्ताः / वल्ग रगु लगु तगु श्रगु अगु श्लगु स्वगु वगु मगुश्रित् // 41 // उगु इगु रिगु लिगु गमने त्वगु कम्पे चाथ युगु जुगु वुगुः स्युः / वर्जन इहाथ घान्ता गग्घ हासे पालने तु दघु // 42 // अघुङ् वघुङ वेगार्थों कैतवे च मघुङ् मतः। . राघुङ् लाघृङ् तु सामर्थ्य द्राघृङ् कदर्थने च वै // 43 // रघुङ् लघुङ् गतौ श्लाघृङ् कत्थने लघु शोषणे। आघ्राणे शिघु चान्तास्तु डुयाग्याचनार्थकः // 44 // कुच शब्दे तारे स्यादपनयने लुञ्च अर्च पूजायाम् / अञ्च् गतौ च वञ्चू चञ्चू तञ्चू मुचू त्वञ्चू // 45 // मञ्चू मुञ्चू मुञ्चू म्लुचू ग्लुचू गतौ हि षश्चामि / शुच शोके क्रुञ्च गतौ कुञ्च च कौटिल्यतानवयोः // 46 // 282