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________________ // 136 // // 137 // * // 138 // // 139 // // 140 // पर्वता अपि शीर्यन्ते, शुष्यन्ति च जलाशयाः / / यत्र तत्रान्यवस्तूनां, सारता कुत्र कल्प्यते ? एवं सांसारिकाः सर्वे, भावा वैरस्य हेतवः / रम्भास्तम्भोपमाः प्रायो, निस्साराः क्षणभङ्गुराः जीवेनानन्तशः क्षुण्णे, चतुर्गतिगतागतैः / तथाप्यलब्धपर्यन्ते, ह्यनादौ भवसागरे अलब्धान्तः परिस्पन्दे, दुःखश्वापदसङ्कुले / व्याधिजन्मजरामृत्यु - वारिवारभयङ्करें प्रमादमदिरामूढो, विचेता नष्टसद्गतिः / . कः प्राणी पतितो, नात्र, व्यूढो विषयवीचिभिः नानायोनिसमाकीर्णे, जीवः कर्मविनिर्मिताम् / त्रैलोक्यरङ्गे नटव - द्धत्तेऽनेकस्वरूपताम् क्वचिन्नारकभावेन, क्वचित्तिर्यग्योनिकः / क्वचिच्च जायते मर्यो, दिवि देवः कदाचन क्वचिद्राजा क्वचिद्रङ्कः, क्वचिदुःखी क्वचित्सुखी / क्वचिनिन्द्यः क्वचिद्वन्द्यः, क्वचिद् ज्ञानी क्वचिज्जडः सुरूपः सुभगः क्वापि, कुरूपो दुर्भगः क्वचित् / / क्वचिद् द्वेष्यः प्रियः क्वापि, जीवो जगति जायते प्रियाप्रयोजने केचि - स्केचिच्चापत्यचिन्तया / नीरोगताकृते केचित्, केचिद्धनजिगीषया खिद्यन्ते सर्वदा जीवा असम्पूर्णमनोरथाः / रागद्वेषग्रहग्रस्ता, विवदन्तः परस्परम् // .141 // // 142 // // 143 // // 144 // // 145 // // 146 // चिन्तितान्यपि जीवा ........ // 147 // 108
SR No.004461
Book TitleShastra Sandesh Mala Part 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinayrakshitvijay
PublisherShastra Sandesh Mala
Publication Year2005
Total Pages354
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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