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________________ जैन धर्म एवं दर्शन-133 जैन धर्म एवं साहित्य का इतिहास-129 खरतरगच्छ बृहद्गुर्वावलि, वृद्धाचार्य प्रबंधावलि, खरतरगच्छ पट्टावलीसंग्रह, गुर्वावलि, गुर्वावलि या तपागच्छ पट्टावलीसूत्र, सेनपट्टावली, बलात्कारगण की पट्टावलियाँ, काष्ठासंघ माथुरगच्छ की पट्टावली, काष्ठासंघ लाडबागडगच्छ पुन्नाटगच्छ की पट्टावली आदि। इनके अतिरिक्त, कुछ तीर्थमालाएँ और विज्ञप्तिपत्र भी संस्कृत में लिखित हैं, जिनमें अनेक ऐतिहासिक तथ्य समाहित हैं, साथ ही अनेक प्रतिमा या मूर्ति लेख भी संस्कृत में मिलते हैं। अनेकार्थकसंधानकाव्य भी जैनाचार्यो के द्वारा संस्कृत में लिखित हैं, यथा- द्विसन्धानमहाकाव्य, सप्तसंधानकाव्य आदि। इनके अतिरिक्त, समयसुन्दरगणि (17 वीं शती) ने एक ही पद 'राजानोददते सौख्यम्' के आठ लाख अर्थ करते हुए अष्टलक्षी नामक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा था। संस्कृत की गद्यकाव्य-शैली एवं चम्पूकाव्य-शैली में जैनाचार्यों के निम्न ग्रन्थ मिलते हैं- तिलकमंजरी, तिलकमंजरीकथासार, गद्यचिन्तामणि आदि। चम्पूकाव्यों में कुवलयमाला, यशस्तिलकचम्पू, जीवनधरचम्पू, पुरूदेवचम्पू, चम्पूमण्डन आदि ग्रन्थ जैनाचार्यों द्वारा रचित हैं, गीतिकाव्य, रसमुक्तक गीतिकाव्य, दूतकाव्य या सन्देशकाव्य (खण्डकाव्य) जैनाचार्यों ने लिखे हैं, यथा पाश्र्वाभ्युदय नेमिदूत, जैनमेघदूत, शीलदूत, पवनदूत आदि अनेक दूतकाव्य। इसके अतिरिक्त, जैनाचार्यों ने संस्कृत में पादपूर्ति साहित्य भी लिखा है। इसमें अनेक ग्रन्थ मेघदूत की पादपूर्ति के रूप में लिखे गये, साथ ही, जैनाचार्यों ने कुछ सुभाषितों और अनेक स्तोत्र भी संस्कृत भाषा में लिखे हैं। उनके स्तोत्र-साहित्य को अनेक संग्रह ग्रन्थों में समाहित किया गया है। ये स्तुति-स्तोत्र सहस्रों की संख्या में हैं। साथ ही, दृश्यकाव्य के रूप में अनेक नाटकों की रचना भी रामचन्द्र आदि .जैनाचार्यों ने की है, जैसे- सत्यहरिशचन्द्र, नलविलास, मल्लिकामकरन्द, कौमुदीमित्राणन्द, रघुविलास, निर्भयभीमव्यायोग, सेहिणीमृगांक, राघवाभ्युदय, यादवाभ्युदय, वनमाला, चन्द्रलेखाविजयप्रकरण, प्रबद्धरौहिणेय, द्रौपदीस्वयंवर, मोहराजपराजय, मुद्रितकुमुदचन्द्र, धर्माभ्युदय, क्षमामृत, हम्मीरमदमर्दन, करूणावजायुध, अंजनापवनंजय, सुभद्रानाटिका, विक्रान्तकौरव, मैथिलीकल्याण, ज्योतिष्प्रभानाटक, रम्भामंजरी, ज्ञानचन्द्रोदय, ज्ञानसूर्योदय आदि। आगमिक-व्याख्याओं दर्शन, काव्य, नाटक, दूतकाव्य
SR No.004421
Book TitleJain Dharm evam Sahitya ka Sankshipta Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherPrachya Vidyapith Shajapur
Publication Year2015
Total Pages152
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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