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________________ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक 36 कथं पुनस्तदेवंविधविषयं मन:पर्ययज्ञानं परीक्ष्यते इत्याह;क्षायोपशमिकं ज्ञानं प्रकर्षं परमं व्रजेत् / सूक्ष्मे प्रकर्षमाणत्वादर्थे तदिदमीरितम् // 5 // न हि क्षायोपशमिकस्य ज्ञानस्य सूक्ष्मेऽर्थे प्रकृष्यमाणत्वमसिद्ध तज्ज्ञानावरणहानेः प्रकृष्यमाणत्वसिद्धेः। प्रकृष्यमाणात्तज्ज्ञानावरणहानित्वान्माणिक्याद्यावरणहानिवत्। कथमावरणहानेः प्रकृष्यमाणत्वे सिद्धेऽपि क्वचिद्विज्ञानस्य प्रकृष्यमाणत्वं सिद्ध्यतीति चेत् प्रकाशात्मकत्वात् / यद्धि प्रकाशात्मकं तत्स्वावरणहानिप्रकर्षे प्रकृष्यमाणं दृष्टं यथा चक्षुः / प्रकाशात्मकं च विवादाध्यासितं ज्ञानमिति स्वविषये प्रकृष्यमाणं सिद्ध्यत्, तस्य परमप्रकर्षगमनं साधयति। यत्तत्परमप्रकर्षप्राप्तं क्षायोपशमिकज्ञानं स्पष्टं तन्मन:पर्यय इत्युक्तं / यथा चापि मतिश्रुतानि परमप्रकर्षभाञ्जि क्षायोपशमिकानीति दर्शयन्नाह मन:पर्ययज्ञान द्रव्य की कुछ पर्यायों को और रूपीद्रव्य को जानता है। यह कैसे जाना जाता है? ऐसा पूछने पर आचार्य कहते हैं - सूक्ष्म अर्थों को जानने में उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त, कर्मों के क्षयोपशम से उत्पन्न हुआ क्षायोपशमिक ज्ञान, सूक्ष्म अर्थ में परम प्रकर्ष को प्राप्त हो जाता है अत: क्षायोपशमिक चार ज्ञानों में यह मन:पर्ययज्ञान अनन्तवें भाग सूक्ष्म द्रव्य को विषय करने वाला है, ऐसा कहा गया है॥५॥ क्योंकि क्षायोपशमिक ज्ञान का सूक्ष्म अर्थों में तारतम्यरूप से प्रकर्ष को प्राप्त हो जाना असिद्ध नहीं है। कारण कि उन ज्ञानों के प्रतिपक्षी ज्ञानावरण कर्मों की हानि का उत्तरोत्तर अधिकरूप से प्रकर्षपना सिद्ध है। जैसे-जैसे ज्ञानावरण कर्मों की हानि होती है, वैसे-वैसे ज्ञानों की सूक्ष्म अर्थों को जानने में प्रवृत्ति भी अधिक-अधिक होती जाती है। कर्मों की हानि का प्रकृष्यमाणपना भी असिद्ध नहीं है। क्योंकि, माणिक आदि के आवरणों की हानि के समान हानिपना होने से उन ज्ञानावरण कर्मों की हानि चरमसीमा तक बढ़ती चली जाती है। प्रश्न - आवरणों की हानि का उत्तरोत्तर प्रकर्ष सिद्ध होने पर भी किसी सूक्ष्म अर्थ में विज्ञान का प्रकृष्यमाणपना कैसे सिद्ध हो सकता है? उत्तर - वह ज्ञान प्रकाशात्मक है। जो-जो प्रकाश आत्मक पदार्थ हैं, वे-वे अपने-अपने आवरणों की हानि का प्रकर्ष होने पर प्रकर्ष प्राप्त होते देखे गए हैं। जैसे चक्षु इन्द्रिय प्रकाशस्वरूप है, अतः स्वकीय आवरणों के तारतम्य भाव से दूर हो जाने पर उत्तरोत्तर दृष्टि निर्मल होती जाती है। विवाद में अध्यासीन (पड़ा हुआ) क्षायोपशमिकज्ञान भी प्रकाशात्मक है अतः अपने विषय में प्रकृष्यमाण सिद्ध होता हुआ उस ज्ञान के परम प्रकर्ष तक गमन करने को सिद्ध करता है, वह क्षायोपशमिक ज्ञान विशद प्रतिभासी होता हुआ उस सूक्ष्म अर्थ को जानने में परमप्रकर्ष को प्राप्त होता है, वह मन:पर्ययज्ञान है-ऐसा कहा गया है। जैसे क्षयोपशमजन्य मतिज्ञान और श्रुतज्ञान भी अपने-अपने विषय में परमप्रकर्ष को प्राप्त होते हैं, इसी बात को दिखलाते हुए ग्रन्थकार कहते हैं -
SR No.004287
Book TitleTattvarthashloakvartikalankar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherSuparshvamati Mataji
Publication Year2010
Total Pages358
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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