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________________ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक 34 तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य // 28 // किमर्थमिदमित्याहक्व मनःपर्ययस्यार्थे निबन्ध इति दर्शयत् / तदित्याद्याह सत्सूत्रमिष्टसंग्रहसिद्धये // 1 // कस्य पुनस्तच्छब्देन परामर्शो यदनन्तभागेऽसर्वपर्यायेषु निबंधो मनःपर्ययस्येत्याह;परमावधिनिर्णीते विषयेऽनन्तभागताम् / नीते सर्वावधे यो भागः सूक्ष्मोऽपि सर्वतः॥२॥ एतस्यानन्तभागे स्याद्विषयेऽसर्वपर्यये। व्यवस्थर्जुमतेरन्यमनःस्थे प्रगुणे ध्रुवम् // 3 // अमुष्यानन्तभागेषु परमं सौक्ष्म्यमागते। स्यान्मन:पर्ययस्यैवं निबन्धो विषयेखिले // 4 // अवधिज्ञान के विषय को नियत कर अब क्रमप्राप्त दूसरे मन:पर्यय नामक प्रत्यक्ष के विषय का नियम करने के लिए श्री उमास्वामी आचार्य सूत्र कहते हैं सर्वावधिज्ञान द्वारा गृहीत रूपीद्रव्य के अनन्तवें एक भाग में मन:पर्यय का विषय नियत है अर्थात् अनन्त परमाणु वाले कार्माण द्रव्य के अनन्तवें भाग को सर्वावधि ज्ञान से जाना गया था। उसके भी अनन्तवें भाग स्वरूप छोटे पुद्गलस्कन्ध को द्रव्य की अपेक्षा मनःपर्यय ज्ञान जानता है // 28 // यह “तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य' सूत्र किस प्रयोजन को साधने के लिए कहा गया है? इस प्रकार की जिज्ञासा होने पर श्री विद्यानन्द स्वामी कहते हैं मन:पर्ययज्ञान का विषय कौन से अर्थ में नियमित है? इस बात को दिखलाते हुए श्री उमास्वामी आचार्य ने अभीष्ट अर्थ के संग्रह की सिद्धि के लिए ‘तदनन्तभागे' इत्यादिक सूत्र को कहा है॥१॥ इस सूत्र में दिये गए तत् शब्द के द्वारा किस पूर्व निर्दिष्ट पद का परामर्श किया गया है? जिसके कि अनन्तवें भाग में और उसकी असर्व पर्यायों में मन:पर्यय ज्ञान का विषय नियत है? इस प्रकार जिज्ञासा होने पर श्री विद्यानन्द आचार्य कहते हैं - परमावधि द्वारा निर्णीत विषय में जिनदृष्ट अनन्त का भाग देने पर अनन्तवें भाग को प्राप्त छोटे स्कन्ध में सर्वावधि का विषय समझना चाहिए। यद्यपि यह सबसे सूक्ष्म भाग है, फिर भी इस सूक्ष्म स्कन्ध के अनन्तवें भाग स्वरूप और कतिपय पर्याय वाले विषय में ऋजुमतिज्ञान की द्रव्य अपेक्षा विषय व्यवस्था नियत है। छोटा वह स्कन्ध सरलरूप से त्रियोग द्वारा दूसरे के मन में स्थित होना चाहिए। उस अनन्तवें भाग छोटे स्कन्ध को निश्चितरूप से ऋजुमति मन:पर्यय जान लेता है। पुनःऋजुमति के विषय से सूक्ष्म स्कन्ध के अनन्त भागों के करने पर जो परम सूक्ष्मपने को प्राप्त हो गया है उस अल्पीयान् स्कन्ध को विपुलमति विषय कर लेता है। इस प्रकार पूर्वोक्तानुसार सम्पूर्ण विषय में मन:पर्ययज्ञान का नियम है। अर्थात् - अपने या दूसरे के मन में चिंतित सभी रूपी द्रव्य और उनकी कतिपय पर्यायों को मनःपर्ययज्ञान प्रत्यक्ष जान लेता है॥२-३-४॥
SR No.004287
Book TitleTattvarthashloakvartikalankar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherSuparshvamati Mataji
Publication Year2010
Total Pages358
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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