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________________ 100KGeeeee. 000000000 333333333333333333333333333333333333222222222 नियुक्ति गाथा-11 -पुनः पांचवें समय में उनका संकोच प्रारम्भ होकर मंथान-आकार हो जाता है, छठे समय में ca कपाट-आकार हो जाता है, सातवें समय में दण्ड-आकार हो जाता है और आठवें समय में वे शरीर , ल में प्रवेश कर पूर्ववत् शरीराकार से अवस्थित हो जाते हैं। पहले और आठवें में वे औदारिक शरीर-काययोग का प्रयोग करते हैं। दूसरे, छठे और सातवें समय में वे औदारिक मिश्र शरीर-काययोग का प्रयोग करते हैं। तीसरे, चौथे, और पांचवें समय में वे कार्मण शरीर-काययोग का प्रयोग करते हैं। a इन आठ समयों के भीतर नाम, गोत्र और वेदनीय कर्म-की स्थिति, अनुभाग और प्रदेशों की उत्तरोत्तर असंख्यात गुणित क्रम से निर्जरा होकर उनकी स्थिति अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण रह जाती है। . तब वे सयोगी जिनन्द्र योग-निरोध की क्रिया करते हुए अयोगी बनकर चौदहवें गुणस्थान में प्रवेश करते हैं और 'अ, इ, उ, ऋ, लु' -इन पांच ह्रस्व अक्षरों के प्रमाणकाल में शेष रहे चारों अघाति-कर्मों की एक साथ सम्पूर्ण निर्जरा करके मुक्ति को प्राप्त करते हैं। & सभी केवली भगवान् समुद्घात करते हैं, या नहीं करते हैं? इस विषय में श्वेताम्बर और 2 दिगम्बर शास्त्रों में दो-दो मान्यताएं स्पष्ट रूप से लिखित मिलती हैं। पहली मान्यता यही है कि सभी केवली भगवान् समुद्घात करते हुए ही मुक्ति प्राप्त करते हैं। किन्तु दूसरी मान्यता यह है कि जिनको 1 a छह मास से अधिक आयुष्य के शेष रहने पर केवलज्ञान उत्पन्न होता है, वे समुद्घात नहीं करते हैं। " किन्तु छह मास या इससे कम आयुष्य शेष रहने पर जिनको केवलज्ञान उत्पन्न होता है, वे नियम से समुद्घात करते हुए हुए ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। - जब केवली का आयुष्य कर्म अन्तर्मुहूर्त रह जाता है और शेष नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मों की स्थिति अधिक शेष रहती है, तब उनकी स्थिति का आयुष्यकर्म के साथ समीकरण करने के लिए c. समुद्घात किया जाता होता हैं। औपपातिक सूत्र में केवलिसमुद्घात का कारण इस प्रकार बताया a गया है-केवलियों के वेदनीय, आयुष्य, नाम तथा गोत्र -ये चार कर्माश अपरिक्षीण होते हैं-सर्वथा क्षीण नहीं होते, उनमें वेदनीय कर्म सबसे अधिक होता है, आयुष्य कर्म सबसे कम होता है, बन्धन & एवं स्थिति द्वारा विषम कर्मों को वे सम करते हैं। निष्कर्ष यह है कि बन्धन और स्थिति से विषम a. कर्मों को सम करने हेतु केवली आत्मप्रदेशों को विस्तीर्ण करते हैं, समुद्घात करते हैं। ca प्रस्तुत प्रकरण में केवली समुद्घात में होने वाले आत्मप्रदेशों के विस्तार में और भाषावर्गणा a के द्रव्यों के लोकान्त-स्पर्श में अन्तर बताया गया है। यदि भाषा वर्गणा के द्रव्यों में समुद्घात वाला नियम लागू हो तो भाषा द्रव्य तीन समयों में ही लोकान्त-स्पर्श कर लेंगे, जब कि आगम मान्यता " | यह है कि उन्हें चार समय लगते हैं। अतः आगम-विरोध प्रसक्त होता है। (r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r)(r) -888888888888888888888888888888888 101
SR No.004277
Book TitleAvashyak Niryukti Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumanmuni, Damodar Shastri
PublisherSohanlal Acharya Jain Granth Prakashan
Publication Year2010
Total Pages350
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size10 MB
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