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________________ 10 ] बृहत्संग्रहणीरत्न हिन्दी [ मंगलके प्रकार राक्षस, रण, राज्यादि भयोंका नाश करता है / (2) ____नवकार मन्त्रके बारेमें बहुत लिखा जा सकता है। साथ ही नवकार मन्त्रके प्रभावसे सर्प भी फूलकी मालारूप बन जानेका और तदुपरांत दूसरे अनेक दृष्टांत भी प्रसिद्ध हैं, लेकिन यहां वह सब अप्रस्तुत है। तो ज्यादा अन्य ग्रन्थोंसे जान लेना / 6. सर्वविघ्नविदारक मन्त्र अतः इतना तो स्पष्ट ही है कि ' एसो मंगल निलयो' वचनसे यह मन्त्र सर्व मंगलोंका स्थान है और श्रेष्ठ है, यह सिद्ध होता है। ऐसे ऐसे अनेक कारणोंसे इस पंच-परमेष्ठी महामन्त्रका अनेक परमर्षि-पुरुषोने जिस तरह (प्रायः ) प्रत्येक ग्रन्थके प्रारम्भमें. स्मरण किया है वैसे इस ग्रन्थके रचयिता महर्षि श्री चन्द्रसूरि महाराजने भी उस विघ्नविदारक मन्त्रका प्रारम्भने ही मंगलरूपमें आदर किया है। 7. मंगलके प्रकार यह मंगल दो प्रकारसे हैं। द्रव्य और भाव, इसमें भाव-मंगल, यह अनेक मंगलों मेंसे एक सर्वप्रधान मंगल है। इसीलिए हरएक पूज्य ग्रन्थकारोंने उस भावमंगलका अवश्य 4. किसी एक नगरमें एक श्राविका है। उसका पति मिथ्यादृष्टि है / वर्तमान पत्नीको पुत्र न होनेसे वह अन्य स्त्रीको घरमें लाना चाहता है। किन्तु जबतक एक पत्नी विद्यमान है, तबतक अन्य स्त्रीकी प्राप्ति दुर्लभ होनेके कारण, अपनी पत्नीको मार डालनेका उपाय सोचता है कि किस तरह इसको मार डालूँ ? एक दिन किसी स्थानसे काले रंगके सर्पको पकड़ाकर एक घटमें उस सर्पको बन्द करके उस घटको घरके कोनेमें रख दिया / भोजन करनेके बाद अपनी पत्नीसे कहा कि-कोनेमें रखे घटमेंसे पुष्पमाला ला ? पतिका वचन सुनकर अन्धेरेमें टटोलती और भय दूर करने मनमें नवकार मन्त्रका स्मरण करती हुई वह स्त्री सोचती है कि “अन्धेरेमें किसी जहरीली जन्तुके काटनेसे अगर मेरी मृत्यु होगी तो भी नवकार मन्त्रके प्रभावसे मेरी वैमानिक देवगति होगी' स्त्रीसे स्मरित इस नवकार मन्त्रके प्रभावसे पासमें उपस्थित किसी देवताने घटमें रहे सर्पके स्थान पर पुष्पमाला स्थापित कर दी, उस स्त्रीने भी घटमेंसे उस पुष्पकी मालाको लेकर अपने पतिको दी। पतिको अत्यन्त आश्चर्य हुआ। जिस घटमें सर्प रखा था उसी घटसे पुष्पमाला लेनेके सम्बन्धमें और नवकार मन्त्रके स्मरणके विषयमें सारा वृत्तांत पत्नीसे जानकर पति पत्नीके चरणोंमें पड़ा और मनमें सोचे हुए अपने अशुभ विचारके लिए क्षमा मांगने लगा / फिर उन दो!का संसार सुखी हुआ। [ नवकार कथावली अपभ्रंश ] विशेष जानकारीके लिए नवकार मन्त्र विषयक 'नमस्कार स्वाध्याय' आदि मुद्रित, अमुद्रित अनेक कल्यो, मन्त्रो, यन्त्रो और स्तोत्रोके साहित्यका अवलोकन करना। .. 5. मंगलकी चउभंगी भी पड़ती है, वह गुरुगमसे जान लेना /
SR No.004267
Book TitleSangrahaniratna Prakaran Bruhat Sangrahani Sutra
Original Sutra AuthorChandrasuri
AuthorYashodevsuri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year1984
Total Pages756
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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