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________________ करने के बाद दूसरे वर की इच्छा भी नहीं करती है। गर्भावस्था में सीताजी को राम ने जब वन में त्याग किया था, तब सीताजी ने राम को सूचित करवाया था कि “मेरा त्याग किया तो भले किया, आपको मेरे से भी अच्छी दूजी पत्नी मिल जाएगी। मेरे बिना आपका मोक्ष अटकने वाला नहीं है किन्तु लोकवचन को सुनकर जैसे मेरा त्याग किया, वैसे जैन धर्म का त्याग मत करना, क्योंकि जैन धर्म का त्याग करने के बाद जैन धर्म से अच्छा तो क्या पर उनके जैसा भी दूजा धर्म प्राप्त होने वाला नहीं है और जैन धर्म के बिना तो निश्चित आपका मोक्ष अटकने वाला है। श्री मलधारी हेमचन्द्रसूरि महाराज रचित पुष्पमाला नामक ग्रंथ में यह अधिकार आता है।" ठीक वैसे ही राजीमति को भी अब यह विश्वास हो चुका है कि श्री नेमिनाथ स्वामी मेरे नव-नव भव के स्नेह को छोड़कर मुक्ति स्त्री के पीछे निश्चित रागवान् हुए हैं तो उसे मुझे जागृत करना उचित है। मुक्ति राग अर्थात् मोक्षरुचि वह सामान्य वस्तु नहीं है। प्रश्न हो सकता है कि क्या नेमिनाथ स्वामी नहीं समझते थे, वफादार एवं स्नेहल व्यक्तियों का दिल ही इतना सरल होता है कि सामने वाले को ध्यान में होते हुए भी और सावधानी के लिए मौका मिलते ही उस ओर ध्यान खींचना चाहिए। उस रीति से ही राजुल कह रही है, “हे स्वामी! आपने मुझे ही अनंता सिद्ध के भोक्ता, अनंत स्वामी को धरना मुक्ति नारी के साथ आपने प्यार किया तो कोई बात नहीं, पर ध्यान रखना कि मुक्ति के प्रति प्रीति करना सरल है पर उसे निभाना उतना ही दुष्कर है, क्योंकि मेरे जैसी सामान्य नारी से प्यार करने के बाद कभी आपकी कोई गलती हो जाए, आप आकुल-व्याकुल हो विश्वासभंग कर दो तो भी हम आपको छोड़ने वाले नहीं हैं। आप नाराज हो जाएं तो हम तो मना लेंगे पर वो मुक्ति तो ऐसी है कि आप थोड़ा भी संसार रूपी भव वन के अभिनंदन में, आनंद में आसक्त हो गये तो वो आपका त्याग करने में थोड़ा भी विचार नहीं करेगी। जो आप नाराज हो गये तो वो भी नाराज हो जायेगी। मुक्ति के साथ आपकी प्रीति को अखण्ड, अमर, शाश्वत रखना हो तो भवनिर्वेद विषय-विराग एवं धर्म-संवेग को जागृत रखना पड़ेगा। इसलिए महर्षि भी प्रार्थनासूत्र में सबसे प्रथम भवनिव्वेओं में चाहना करता है। राजीमती आगे कह रही है कि जैसे झेरी सर्प के साथ खेलना एवं अग्नि की झाल के साथ रमत करना मुश्किल है, वैसे ही मुक्ति के प्रति राग दिखाना बहुत ही कठिन है। उनके लिए तो जीवनभर समस्त संसार के प्रति अरुचि रखनी पड़ेगी। इतना कहने के बाद भी जब राजीमती ने देखा कि नेमिनाथ वापिस नहीं लौट रहे, नेमिनाथ स्वामी का मुक्ति के प्रति अटूट बंधन है, वो मुक्ति की ओर ही प्रयाण कर रहे हैं तब राजीमति ने भी अपना निर्णय जाहिर किया कि भले ही शादी करके आपने हाथ पर मेरा हाथ न रखा, पर मैं दीक्षा लेते वक्त हे जगन्नाथ! अपने सिर पर आपका हाथ रखवाऊँगी। अपूर्व रहस्य से भरा हुआ उपाध्यायजी का ग्रंथ पू. उपाध्याय महाराज का गुजराती, संस्कृत या प्राकृत सभी ग्रंथ अपूर्व रहस्य से भरा हुआ है। उस रहस्यों को समझने के बाद अपूर्व स्फुरणा उत्पन्न होती है, उसमें रहे हुए पदार्थ विवेचना प्रभावना करे, ऐसा है। जैसे उपाध्याय रचित अनेकान्तव्यवस्था नामक ग्रंथ में एक स्थान पर प्रश्न किया हुआ है कि तत्त्वार्थ, महाशास्त्र में तत्त्व सात बताये हैं, आठ क्यों नहीं, क्योंकि सही में तो जीव और अजीव दो तत्त्व ही है किन्तु मोक्षोपयोगी हेयोपादेय तत्त्व पृथक् बताने चाहिए, जिसमें हेय रूप में आश्रव एवं बंध, उपादेय रूप में संवर और निर्जरा कहा, फिर भी हेय का दान और उपादेय का उपादान क्यों कहा, 506 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004261
Book TitleMahopadhyay Yashvijay ke Darshanik Chintan ka Vaishishtya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmrutrasashreeji
PublisherRaj Rajendra Prakashan Trust
Publication Year2014
Total Pages690
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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