SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 471
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ और स्मृत्युयोग का अनुपस्थान ये सामायिक व्रत के पाँच अतिचार हैं। कायदुष्प्रणिधान- दुष्प्रणिधान यानी अन्यथा प्रवर्तना। प्रविधान, प्रयोग और परिणाम ये एकार्थवाची हैं। दुष्ट जो पाप परिणाम उसे दुष्प्रणिधान कहते हैं। अथवा योगों का अन्यथा प्रवर्तन योग-दुष्प्रणिधान है। क्रोधादि कषायों के वश होकर शरीर के अवयवों का विचित्र अनेक रूप विकृत-रूप हो जाना काय-दुष्प्रणिधान है। वाचनिक दुष्प्रणिधान- वर्णसंस्कार का अभाव तथा अर्थ के आगमकत्व में चपलता अर्थात् निरर्थक अशुद्ध वचनों का प्रयोग करना वाचनिक दुष्प्रणिधान मानसिक दुष्प्रणिधान- मन का अनर्पितत्व होना, अन्यथा होना, मन का उपयोग नहीं लगना मानसिक दुष्प्रणिधान है। अनादर- अनुत्साह को अनादर कहते हैं। कर्त्तव्य कर्म का जिस-किसी तरह निर्वाह करना अनादर या अनुत्साह है। अर्थात् सामायिक के प्रति उत्साह नहीं होना ही अनादर है। स्मृत्यनुपस्थान- एकाग्रता का न रहना ही स्मृत्यनुपस्थान है। अनेकाग्रता असमाहित मनस्कता और स्मृत्यनुपस्थान ये सब एकार्थवाची हैं। अर्थात् चित्त की एकाग्रता न होना और मन में समाधिरूपता का न होना स्मृत्यनुपस्थान कहा जाता है। प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत के अतिचार अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनपस्थानानि। (34) The partial transgression of the second शिक्षाव्रत i.e. प्रोषधोपवास are: 1. अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग To excrete in a place without inspecting and without sweeping 456 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004251
Book TitleSwatantrata ke Sutra Mokshshastra Tattvartha Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanaknandi Acharya
PublisherDharmdarshan Vigyan Shodh Prakashan
Publication Year1992
Total Pages674
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy