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________________ 236 प्रश्नव्याकरण सूत्र श्रु० 2 अ० 2 **************************************************************** अर्चनीय, असुरगणाणं - असुरगण का, य - और, पूणिजं - पूजनीय, अणेगपासंडिपरिग्गहियं - अनेक पाखण्डियों द्वारा स्वीकृत, लोगम्मि - जगत् में, सारभूयं - सारभूत, गंभीरयरंमहासमुहाओ - महान् समुद्र से भी अत्यन्त गम्भीर है, थिरयरगंमेरुपव्वयाओ - मेरुपर्वत से भी अधिक स्थिर है, सोमयरगंचंदमंडलाओ - चन्द्रमण्डल से भी अधिक सौम्य है, दित्तयरंसूरमंडलाओ - सूर्य-मंडल से भी अधिक प्रकाशवान् है, विमलयरंसरयणहयलाओ - शरत्काल के आकाश से भी अधिक निर्मल है, सुरभियरं गंधमादणाओ - गन्धमादन पर्वत से भी अधिक सुगन्धिमय है, जे वि - दूसरे जितने भी, लोगम्मि - लोक में, अपरिसेसा - विशेष-समस्त, मंतजोगा - वशीकरण आदि मंत्र-योग, जवा - मंत्रविद्या का जाप, विजा - प्रज्ञप्ति आदि विद्याएं, जंभगा - जृम्भक देव, अत्थाणि - अस्त्र, सत्याणिशस्त्र, सिक्खाओ - शिक्षा, आगमा - आगम, सव्वाइं - सभी, ताई - वे, सच्चे - सत्य में, पइट्ठियाई - प्रतिष्ठित हैं। ___ भावार्थ - तीर्थंकर भगवंतों ने सत्य का बड़ी उत्तमता के साथ वर्णन किया है। सत्य वचन के दस भेद हैं। चौदह पूर्वधर, श्रुतकेवली महापुरुषों ने सत्य को सत्यप्रवाद पूर्व से प्रकाशित किया है। महर्षियों ने सत्य को सिद्धान्त के रूप में प्रचारित किया है। देवेन्द्रों और नरेन्द्रों ने सत्य-भाषण रूप धर्म के प्रयोजन एवं परिणाम का अनुभव किया है। वैमानिक देवों ने भी सत्य की साधना का फल. पाया और सत्य वचन का आदर किया है। यह सत्य महान् अर्थ वाला है। जीवों के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यह मंत्र, औषधि और विद्याओं को सिद्ध करने का साधन है। सत्य वचन के प्रभाव से ही चारणगण और श्रमणों को आकाश-गमन एवं वैक्रिय-विद्या की सिद्धि होती है। सत्य, मनुष्यगणों के लिए वन्दनीय है, देवगण के लिए अर्चनीय तथा असुरगण के लिए पूजनीय है। अनेक प्रकार के व्रतों का पालन करने वाले पाखण्डियों ने भी सत्य को स्वीकार किया है। यह सत्य, लोक में सारभूत है। सत्य, महासमुद्र से भी अति गम्भीर है, मेरुपर्वत से भी अत्यधिक स्थिर है, चन्द्रमण्डल से भी अत्यन्त सौम्य है, सूर्य-मंडल से भी अधिक तेजस्वी (प्रकाशमान्) है, शरदकाल के आकाश से भी अत्यन्त निर्मल है और गन्धमादन पर्वत से भी अधिक सुगन्धित है। इस लोक में जितने भी वशीकरणादि मंत्र, योग, जाप, विद्याएं, मुंभक देव, अस्त्र-शस्त्र, शिक्षा एवं आगम हैं, वे सभी सत्य में प्रतिष्ठित हैं अर्थात् सत्यवादी - को ही मंत्रयोगादि सिद्ध होते हैं। विवेचन - सत्य वचन के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए सूत्रकार ने सत्य के दस भेद बतलाए हैं। सत्य तो एक ही है, किन्तु विवक्षा भेद से वह दस प्रकार का बताया गया है। यथा - 1. जनपद सत्य - जो वस्तु जिस देश में, जिस नाम से पुकारी जाती है, वह वहाँ का जनपद सत्य है- उस देश का सत्य है। जैसे - कोकण देश में 'जल' को 'पच्छ' कहते हैं, पंजाब में मक्की को 'कूकड़ी' और बंगाल में गाय को 'गाभी' कहते हैं, क्योंकि यह देश-भाषा है और रूढ़ है। इसमें आशय असत्य नहीं है। अतएव यह 'जनपद सत्य' है। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004201
Book TitlePrashna Vyakarana Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanlal Doshi
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages354
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size8 MB
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