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________________ { १७० ******* प्रश्नव्याकरण सूत्र श्रु० १ अ० ४ मन्त्रनीति-मन्त्रणा करने में; कुसला - कुशल, णाणामणिरयण - विविध प्रकार के मणि और रत्न, विउलधणधण्णसंचयणिही - विपुल धन-धान्य के संग्रह से, समिद्धकोसा - भंडार समृद्ध है, रज्जसिरि- राज्यश्री, विउलमणुहवित्ता- विपुलता से अनुभव करते थे, विक्कोसंता- शत्रुओं का पराभव करने वाले, बलेण मत्ता - जो बल से मदोन्मत्त थे, ते वि वे भी, उवणमंति प्राप्त होते हैं, मरणधम्मं - कालधर्म, अवितत्ता कामाणं कामभोगों से अतृप्त रहते हैं । - - Jain Education International ************ भावार्थ - माण्डलिक नरेन्द्र भी बलवान् थे । उनका अन्तःपुर भी विशाल था । उनकी राज्यसभा होती थी। वे पुरोहित, अमात्य, दण्डनायक, सेनापति और मन्त्रणा - सभा से युक्त थे। वे राजनीति में . थे । अनेक प्रकार के मणिरत्नों और धनधान्यादि संग्रह से उनके भण्डार भरपूर थे । वे राज्य लक्ष्मी पूर्ण रूप से अनुभव करते और अपने शत्रुओं को दबाते हुए, स्वबल तथा सैन्य बल से मदोन्मत्त थे। वे कामभोग में अतृप्त रहे हुए ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। अकर्मभूमिज मनुष्यों के भोग भुज्जो उत्तरकुरु- देवकुरु - वणविवर - पायचारिणो णरगणा भोगुत्तमा भोग लक्खणधरा भोगसस्सिरीया पसत्थसोमपडिपुण्णरूवदरिसणिज्जा सुजायसव्वंग सुंदरंगा रत्तुप्पलपत्तकंतकरचरणकोमलतला सुपइट्ठियकुम्मचारुचलणा अणुपुव्वसुसंहयंगुलीया उणयतणुतंबणिद्धणखा संठियसुसिलिट्ठगूढगुंफा एणीकुरुविंद - वत्तवट्टाणुपुव्विजंघा समुग्गणिसग्गगूढजाणू वरवारणमत्ततुल्लविक्कम - विलासियगई वरतुरगसुजायगुज्झदेसा आइण्णहयव्वणिरुवलेवा पमुइयवरतुरगसीहअइरेगवट्टियकडी गंगावत्तदाहिणावंत्ततरंगभंगुर - रविकिरण-बोहिय-विकोसायंतपम्हगंभीरवियडणाभी साहतसोणंदमुसलदप्पणणिगरियवरकणगच्छरु सरिसवरवइवलियमज्झा उज्जुगसमसहियजच्चतणुकसिणणिद्ध-आइज्जलडहसुमालमउयं-रोमराई झसविहगसुजायपीणकुंच्छी झसोयरा पम्हविगडणाभी सण्णयपासा संगयपासा सुंदरपासा सुजायपासा मियमाइयपीणरइयपासा अकरंडुयकणगरुयगणिम्मलसुजायणिरुवहयदेहधारी कणगसिलातल-पसत्थसमतलउवइयविच्छिण्णपिहुलवच्छा जुयसण्णिभपीणरइयपीवरपट्टसंठियासुसिलिट्ठविसिट्ठलट्ठसुणिचियघणथिर सुबद्धसंधी पुरवरफलिहवट्टियभुया । शब्दार्थ - भुज्जो - पुनः, उत्तरकुरुदेवकुरु - उत्तरकुरु देवकुरु- युगलिकों के क्षेत्र, वणविवरपायचारिणो- वन में अपने पाँवों से ही चलने वाले, णरगणा - मनुष्य गण भोगुत्तमा उत्तम भोगों से युक्त, भोगलक्खणधरा स्वस्तिकादि भोग के लक्षणों से युक्त, भोगसस्सिरीया भोगरूपी लक्ष्मी से युक्त, पसत्थसोमपडिपुण्णरूवदरिसणिज्जा उनकी आकृति प्रशस्त, सौम्य, प्रतिपूर्ण - - For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004201
Book TitlePrashna Vyakarana Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanlal Doshi
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages354
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size8 MB
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