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श्रश्रमण आवश्यक सूत्र - रत्नाधिकों को खमाने का पाठ
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रत्नाधिकों को खमाने का पाठ इच्छामि खमासमणो! अब्भुट्टिओमि अब्भिंतर देवसिय खामेऊ जं किंचि अपत्तियं परपत्तियं भत्ते पाणे विणए वेयावच्चे आलावे संलावे उच्चासणे समासणे अंतरभासाए उवरिभासाए जं किंचि मज्झ विणय-परिहीणं सुहुमं वा बायरं वा तुब्भे जाणह अहं ण जाणामि तस्स मिच्छामि दुक्कडं (ग्रामवि तुब्भे खमामि)। ____कठिन शब्दार्थ - अब्भुट्टिओमि - मैं तैयार (तत्पर, सावधान) हुआ हूँ, अब्भिंतरदेवसिय - दिवस के अन्दर होने वाले अतिचारों की, अपत्तियं - अप्रीति, परपत्तियं - विशेष अप्रीति, विणए - विनय सत्कार में, वेयावच्चे - वैयावृत्य - सेवा करने में, उच्चासणेऊँचा आसन, समासणे - समान आसन, अंतरभासाए - बीच बीच में बोलने से, उवरिभासाएअधिक बोलने से, विणय - विनय में, परिहीणं - हीनता हुई, सुहुमं - सूक्ष्म रूप में, बायरं - बादर रूप में, जाणामि - जानता हूँ।
.. भावार्थ - हे क्षमाश्रमण गुरुदेव! मैं क्षमापना चाहता हूँ। आज दिन भर में होने वाले अतिचारों, को खमाने के लिए मैं तैयार हूँ। आज जो कुछ भी सामान्य या विशेष रूप से अप्रीति हुई हो या दूसरों के निमित्त से अप्रीति हुई हो। वह अप्रीति किस-किस विषय में हो सकती है जैसे - आहार पानी में, गुरु आदि के आने पर उठने आदि रूप विनय सत्कार में, औषध, पथ्य आदि देने पर सहायता सेवा करने में, एक बार बोलने से या बार-बार विशेष बोलने से, गुरु आदि से ऊंचा आसन करने से, गुरु आदि के समान बराबर आसन करने से, रत्नाधिकों के बोलने के समय बीच-बीच में बोलने से तथा रत्नाधिकों के बात करने के बाद उनसे अधिक बोलने से। इस प्रकार सामान्य रूप से थोड़े (छोटे) रूप में या बड़े रूप में मेरे द्वारा शिक्षादि के पालन नहीं करने रूप से जो कुछ भी विनय हीनता हुई हो, वह आप जानते हो, मंदमति होने से मैं नहीं जानता हूँ। मैं अपने उन दोषों को स्वीकार करने व खमाने रूप से मेरे वे सब पाप निष्फल हो।
शिष्य के इस प्रकार खमाने पर गुरुदेव भी कहते हैं, मैं भी आपको (शिष्यों) को खमाता हूँ।
|| प्रथम परिशिष्ट समाप्त॥
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