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________________ ३६४८ भगवती सूत्र-श. ३० उ. २ कृष्णलेश्या वाले नैयिक की उत्पत्ति ४ उत्तर-हे गौतम ! पूर्ववत् । परिमाण-दो, छह, दस, चौदह, संख्णत या असंख्यात उत्पन्न होते हैं । शेष पूर्ववत् । इसी प्रकार धूमप्रमा यावत् अधःसप्तम पृथ्वी पर्यन्त । ५ प्रश्न-कण्हलेस्सखड्डागकलिओग णेरइया णं भंते ! कओ उववजति ? ५ उत्तर-एवं चेव । णवरं एको वा पंच वा णव वा तेरस वा संखेजा वा असंखेजा वा, सेंसे तं चेव । एवं धूमप्पभाए वि, तमाए वि, अहेसत्तमाए वि। सेवं भंते ! सेवं भंते !' त्ति ॥ इकतीसइमे सए बीओ उद्देसो समत्तो ॥ भावार्थ-५ प्रश्न-हे भगवन् ! कृष्णलेश्या वाले क्षुद्रकल्योज राशि प्रमाण नरयिक कहां से आ कर उत्पन्न होते हैं ? ५ उत्तर-हे गौतम ! पूर्ववत् । परिमाण-एक, पांच, नौ, तेरह, संख्यात या असंख्यात उत्पन्न होते हैं । शेष पूर्ववत् । इसी प्रकार घूमप्रभा, तमःप्रभा और अधःसप्तम पृथ्वी पर्यन्त । _ 'हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है । हे भगवन् ! यह इसी प्रकार हैकह कर गौतम स्वामी यावत् विचरते हैं। ... विवेचन-इस दूसरे उद्देशक में कृष्णलेश्या वाले नरयिकों का कथन किया है। यह लेश्या पांचवीं, छठी और सातवीं नरक के नरयिकों में होती है । सामान्य दण्डक और तीन नरक विषयक तीन दण्डक, इस प्रकार यहाँ कुल चार दण्डक होते हैं । इनका उपपात प्रज्ञापना सूत्र के छठे व्युत्क्रान्ति पद के अनुसार है । इनमें असंज्ञी, सरीसृप, पक्षी और सिंह (सभी चतुष्पद) के अतिरिक्त दूसरे तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय और गर्भज मनुष्य उत्पन्न होते हैं । ॥ इकत्तीसवें शतक का दूसरा उद्देशक सम्पूर्ण ॥ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004092
Book TitleBhagvati Sutra Part 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages692
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size11 MB
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