SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 410
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भगवती मूत्र-श. १६ उ. ३ कर्म-वन्ध पयडीओ पण्णत्ताओ ? १ उत्तर-गोयमा ! अट्ट कम्मपयडीओ पण्णत्ताओ, तं जहाणाणावरणिजं जाव अंतराइयं, एवं जाव वेमाणियाणं । २ प्रश्न-जीवे णं भंते ! णाणावरणिजं कम्मं वेदेमाणे कह कम्मपयडीओ वेदेति ? २ उत्तर-गोयमा ! अट्ठ कम्मप्पयडीओ-एवं जहा पण्णवणाए वेयावेउदेसओ सो चेव गिरवसेसो भाणियव्यो । वेदाबंधो वि तहेव, बंधावेदो वि तहेव, बंधाबंधो वि तहेव भाणियव्वो जाव वेमाणि. याणं ति । 'सेवं भंते ! सेवं भंते' त्ति ! जाव विहरइ । कठिन शब्दार्थ-वेदेमाणे-वेदता हुआ। भावार्थ-१ प्रश्न-राजगह नगर में गौतमस्वामी ने यावत् इस प्रकार पूछा कि-हे भगवन् ! कर्म-प्रकृतियाँ कितनी कही गई हैं ? १ उत्तर-हे गौतम ! कर्म-प्रकृतियाँ आठ कही गई हैं । यथा-ज्ञानावरणीय यावत् अन्तराय । इस प्रकार यावत् वैमानिकों तक कहना चाहिये । २ प्रश्न-हे भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म को वेदता हुआ जीव कितनी कर्म-प्रकृतियाँ वेदता है ? २ उत्तर-हे गौतम ! आठ कर्म-प्रकृतियां वेदता है । यहाँ प्रज्ञापना सूत्र का सत्ताईसवां 'वेदावेद' नामक पद सम्पूर्ण कहना चाहिए । इसी प्रकार 'वेदाबन्ध' 'बन्धावेद' और 'बन्धाबन्ध' उद्देशक भी यावत् वैमानिकों तक कहना चाहिए । हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है । हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है-ऐसा कह कर गौतमस्वामी यावत् विचरते हैं। विवेचन-ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मों में से किसी एक कर्म प्रकृति को वेदता Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004090
Book TitleBhagvati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages530
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy