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________________ २२९८ भगवती सूत्र-ग. १४ उ. ३ नरयिकादि में आदर-सत्कार आसणाभिग्गहे इ वा, आसणाणुप्पदाणे इ वा, इंतस्स पच्चुग्गच्छ. णया, ठियस्स पज्जुवासणया, गच्छंतस्स पडिसंसाहणया ? ३ उत्तर-णो इणटे समढे। ४ प्रश्न-अत्थि णं भंते ! असुरकुमाराणं सक्कारे इ वा, सम्माणे इ वा, जाव पडिसंसाहणया ? ४ उत्तर-हंता अस्थि, एवं जाव थणियकुमाराणं । पुढविकाइयाणं जाव चउरिंदियाणं एएसिं जहा णेरइयाणं । ५ प्रश्न-अत्थि णं भंते ! पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं सरकारे इ वा जाव पडिसंसाहणया ? ५ उत्तर-हंता अस्थि, णो चेव णं आसणाभिग्गहे इवा, आसणाणुप्पदाणे इ वा । मणुस्साणं जाव वेमाणियाणं जहा असुरकुमाराणं। कठिन शब्दार्थ-अस्थि-है, सक्कारे-सत्कार अर्थात् वन्दना आदि के द्वारा अथवा उत्तम वस्त्रादि देने के द्वारा आदर करना, सम्माणे-सम्मान-तथाविध सेवा करना, किइकम्मे-कृतिकर्म-वन्दना करना अथवा उनकी इच्छानुसार कार्य करना, अन्भट्टाणे-अभ्युत्थानआदर करने योग्य पुरुप को देख कर आसन छोड़ कर खड़ा हो जाना, अंजलिपग्गहे-अंजलिप्रगृह-दोनों हाथ जोड़ना, आसणाभिग्गहे-आसनाभिग्रह-आसन लाकर देना और 'इस पर विराजो'-ऐसा कहना, आसणाणुप्पदाणे-आसनानुप्रदान-आसन को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाकर विछाना, इंतस्स पच्चुग्गच्छणया-आते हुए आदरणीय पुरुप के सम्मख जाना, ठियस्स पज्जुवासणया-बैठे हुए आदरणीय पुरुप की सेवा करना, गच्छंतस्स पडिसंसाहणयाजब आदरणीय पुरुष उठ कर जावें तो कुछ दूर तक उनके पीछे जाना । भावार्थ-३ प्रश्न-हे भगवन् ! क्या नरयिक, जीवों में सत्कार, सम्मान Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004090
Book TitleBhagvati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages530
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size9 MB
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