SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 267
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १८२२ भगवती सूत्र - श. १० उ. ५ चमरेन्द्र का परिवार १ काली २ राजी ३ रजनी ४ विद्युत् और ५ मेघा । इनमें से एक-एक अग्रमहिषी के आठ-आठ हजार देवियों का परिवार कहा गया है । ३ प्रश्न - हे भगवन् ! क्या एक-एक देवी आठ-आठ हजार देवियों के परिवार की विकुर्वणा कर सकती है ? ३ उत्तर - हे आर्यो ! हाँ, कर सकती है। इस प्रकार पूर्वापर सब मिल कर पांच अग्रमहिषियों का परिवार चालीस हजार देवियाँ हैं। यह एक त्रुटिक (वर्ग) कहलाता है । ४ प्रश्न - हे भगवन् ! क्या असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर अपनी चमरचञ्चा राजधानी की सुधर्मासभा में, चमर नामक सिंहासन पर बैठकर, उस त्रुटिक ( देवियों के परिवार ) के साथ भोगने योग्य दिव्य-भोगों को भोगने में समर्थ है ? ४ उत्तर - हे आर्यो ! यह अर्थ समर्थ नहीं । प्रश्न - हे भगवन् ! क्या कारण है कि 'चमरचञ्चा राजधानी में वह असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर दिव्य-भोग भोगने में समर्थ नहीं है ।' उत्तर - हे आर्यों ! असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर की चमरचञ्चा राजधानी की सुधर्मा नामक सभा में, माणवक चैत्यस्तम्भ में, वज्रमय गोल डिब्बों में जिन भगवान् की बहुत-सी अस्थियाँ हैं, जो कि असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर के लिए तथा बहुत से असुरकुमार देव और देवियों के लिए अर्चनीय, वन्दनीय, नमस्करणीय, पूजनीय तथा सत्कार व सम्मान करने योग्य हैं। वे कल्याणकारी, मंगलकारी, देवस्वरूप, चैत्यरूप पर्युपासना करने के योग्य हैं । इसलिए उन जिन भगवान् की अस्थियों के प्रणिधान ( सन्निधान - समीप ) में वह असुरेन्द्र, अपनी राजधानी की सुधर्मासभा में यावत् भोग भोगने में समर्थ नहीं है । इसलिए हे आर्यो ! ऐसा कहा गया है कि 'असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर चमरचञ्चा राजधानी में यावत् भोग भोगने में समर्थ नहीं है । परन्तु हे आर्यो । वह असुरेन्द्र असुरकुमारराज चमर, चमरचञ्चा राजधानी की सुधर्मा सभा में चमर नामक Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004089
Book TitleBhagvati Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages578
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy